Saturday, May 3, 2025

13> মন্ত্র- তন্ত্র শুভ সময়+ डाकिनी :: एक प्रचंड शक्ति

 >***मंत्र-तंत्र के शुभ समय ***( 1 to 8 )


1---------जानें मंत्र-तंत्र के राजमंत्र साधना में शुभ समय का रखें ध्यान
2-------- तन्त्र समाधान देता है.उलझाता नहीं इसका दुरूपयोग हानि देता है फायदा नही .
3---------हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्रों के बारे में बताया गया है
4--------डाकिनी :: एक प्रचंड शक्ति
5--------दुःख दारिद्रय निवारक चमत्कारी उपाय ==64 योगिनी तंत्र:-
6--------चंडिका प्रयोग
7---------तंत्र, मंत्र, यंत्र और योग साधना का लाभ..
8---------काले जादू और बुरी नजर से बचाती है ये साधारण लगने वाली चीजे
9----------गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच


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তন্ত্র = মন্ত্র

1>जानें मंत्र-तंत्र के राजमंत्र साधना में शुभ समय का रखें ध्यान

मंत्र शब्द का अर्थ असीमित है। वैदिक ऋचाओं के प्रत्येक छन्द भी मंत्र कहे जाते हैं। तथा देवी-देवताओं की स्तुतियों व यज्ञ हवन में निश्चित किए गए शब्द समूहों को भी मंत्र कहा जाता है। तंत्र शास्त्र में मंत्र का अर्थ भिन्न है। तंत्र शास्त्रानुसार मंत्र उसे कहते हैं जो शब्द पद या पद समूह जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है वह उस देवता या शक्ति का मंत्र कहा जाता है।

विद्वानों द्वारा मंत्र की परिभाषाएँ निम्न प्रकार भी की गई हैं।

1. धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं।

2. देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं। (तंत्रानुसार)

3. दिव्य-शक्तियों की कृपा को प्राप्त करने में उपयोगी शब्द शक्ति को मंत्र कहते हैं।

4. अदृश्य गुप्त शक्ति को जागृत करके अपने अनुकूल बनाने वाली विधा को मंत्र कहते हैं। (तंत्रानुसार)

5. इस प्रकार गुप्त शक्ति को विकसित करने वाली विधा को मंत्र कहते हैं।

मंत्र साधना के समय

मंत्र साधना के लिए निम्नलिखित विशेष समय, माह, तिथि एवं नक्षत्र का ध्यान रखना चाहिए।

1. उत्तम माह - साधना हेतु कार्तिक, अश्विन, वैशाख माघ, मार्गशीर्ष, फाल्गुन एवं श्रावण मास उत्तम होता है।

2. उत्तम तिथि - मंत्र जाप हेतु पूर्णिमा़, पंचमी, द्वितीया, सप्तमी, दशमी एवं ‍त्रयोदशी तिथि उत्तम होती है।

3. उत्तम पक्ष - शुक्ल पक्ष में शुभ चंद्र व शुभ दिन देखकर मंत्र जाप करना चाहिए।

4. शुभ दिन - रविवार, शुक्रवार, बुधवार एवं गुरुवार मंत्र साधना के लिए उत्तम होते हैं।

5. उत्तम नक्षत्र - पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, श्रवण रेवती, अनुराधा एवं रोहिणी ‍नक्षत्र मंत्र सिद्धि हेतु उत्तम होते हैं।

मंत्र साधना में साधन आसन एवं माला की विशेषताएँ

आसन - मंत्र जाप के समय कुशासन, मृग चर्म, बाघम्बर और ऊन का बना आसन उत्तम होता है।

माला - रुद्राक्ष, जयन्तीफल, तुलसी, स्फटिक, हाथीदाँत, लाल मूँगा, चंदन एवं कमल की माला से जाप सिद्ध होते हैं। रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ होती है।
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2> तन्त्र समाधान देता है.उलझाता नहीं इसका दुरूपयोग हानि देता है फायदा नही ..

प्रयोग मात्र विश्वास पर आधारित.....
सरल लेकिन शक्तिशाली गोपनीय मंत्र

तंत्र विद्या गोपनीय और रहस्यमयी होती है। हर किसी को यह फलीभूत भी नहीं होती। तामसिक प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों को इससे दूर रहने की ही सलाह दी गई है। जो लोग सात्विकता के साथ इन्हें आजमाते हैं उन्हें यह अवश्य लाभ प्रदान करती है। कुछ मंत्र स्वयं की रक्षा के लिए वर्णित हैं, तो कुछ मंत्र आकर्षण शक्ति बढ़ाने के लिए। प्रस्तुत है कुछ चमत्कारी अचूक मंत्र-

शक्तिशाली आत्मरक्षा मंत्र

'ॐ क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं फट्'

प्रयोग विधि- उपरोक्त मंत्र का नित्य 500 बार जप करने से साधक को समस्त सुख प्राप्त होते हैं और आत्मभय दूर होकर व्यक्ति ‍'निर्भय' हो जाता है।

स्त्री सौभाग्यवर्धक मंत्र

ॐ ह्रीं कपालिनि कुल कुण्डलिनि मे सिद्धि देहि भाग्यं देहि देहि स्वाहा।।

प्रयोग विधि- यह मंत्र कृष्ण पक्ष की चौदस से प्रारंभ करके अगले महीने की कृष्ण पक्ष की तेरस तक- यानी एक मास तक नित्य एक हजार एक बार जाप करने से स्त्रियों की समस्त आधि-व्याधियां दूर होती हैं और स्त्री पति, पुत्र, परिवार आदि की प्रिय हो जाती है।

चोर भयहरण मंत्र

ॐ करालिनि स्वाहा ॐ कपालिनि स्वाहा चोर बंधय ठ: ठ: ठ:।।

प्रयोग विधि- यह मंत्र 108 बार जाप करने से सिद्धि होती है। प्रयोग के समय 7 बार मंत्र पढ़कर थोड़ी सी मिट्टी द्वार पर की भूमि में गाड़ दे तो भवन में चोर घुसने का भय नहीं रहता।।

धन सहित चोर पकड़ने का मंत्र

ॐ ध्रूमाजक हुंकार स्फटिका दह दह ॐ

प्रयोग विधि- मंगलवार या रविवार क दिन कर्मटिका वृक्ष के नीचे मृगासन पर बैठकर गोधूली की लकड़ी जलाएं। सरसों तथा गुग्गल से उपरोक्त मंत्र पढ़ते हुए हवन करने से चोरी किए धन सहित चोर वापस आ जाता है।यह साधको की मान्यता है ..


वशीकरण मंत्र


सबसे पहला मंत्र मोहन और सम्मोहन के सबसे बड़े देवता अर्थात् श्रीकृष्ण का है. मंत्र है-

ॐ क्लीं कृष्णाय नमः

अगर आप किसी व्यक्ति को ध्यान में रखकर और सकंल्प के साथ कहते हैं कि - हे प्रभु! आपकी कृपा से यह व्यक्ति मेरे वश में हो जाये क्योंकि मुझे स्वयं को सही साबित करने का और कोई साधन नही है. ऐसा संकल्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण के संमुख कहेंगे तो निश्चित ही आपको लाभ मिलेगा. जिस किसी व्यक्ति को सम्मोहित करना चाहते हैं, अपनी तरफ़ करना चाहते हैं हो जायेगा.

दूसरा मंत्र भगवान नारायण का है-

ॐ नमो नारायणाय सर्व लोकन मम वश्य कुरु कुरु स्वहा.

अर्थात् हे प्रभु नारायण आपकी कृपा से सर्वलोक को वशीकरण करने की शक्ति मुझमे आ जाये. (सर्वलोक की जगह उस व्यक्ति का भी नाम लिया जा सकता है जिसे सम्मोहित करना हो) वह अवश्य आपके प्रति आकर्षित होगा.
तीसरा मंत्र दुर्गासप्तशती से है-

ज्ञानिनामपि चेतान्शी देवी भगवति हि सा

बलादाsकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्क्षति.

इस अत्यधिक चमत्कारिक मंत्र का 40 दिन तक नियमित रुप से 108 बार जाप करना है. यह मंत्र इतना प्रभावशाली है कि इसका जाप होते ही कितना भी ज्ञानी, विद्वान व्यक्ति क्यों न हो आपके नियंत्रण में आ जायेगा.


चौथा भी एक प्रयोग ही है. इसके लिये -

कही भी जाते समय मोर की कलगी पीले रेशमी वस्त्र में बाँधकर अपने साथ रख लें.

इससे सम्मोहन और आकर्षण की शक्ति बढ़ती है. अथवा

श्वेत अपामार्ग की जड़ को घिसकर माथे पर तिलक लगायें.

इससे भी आपके अन्दर जो सम्मोहन की शक्ति है, उसमे निरन्तर वृद्धि होती है.

पांचवा एक प्रयोग है जिसको करने से केवल एक व्यक्ति ही नही पूरी-पूरी सभा को सम्मोहित किया जा सकता है. इसके लिये आपको करना यह है कि-

तुलसी के चूर्ण में सहदेई के रस को मिलाकर माथे पर तिलक करें.

यदि ऐसा तिलक करके आप किसी सभा अथवा पार्टी में जाते हैं तो सभी आपसे इम्प्रेस रहेंगे. यदि आप किसी एक व्यक्ति को ही आकर्षित करना चाहते हैं तो भी उसके संमुख यही टीका लगाकर जायें. वह अवश्य आपके नियंत्रण में आ जायेगा.
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3>हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्रों के बारे में बताया गया है

हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्रों के बारे में बताया गया है जैसे हनुमान प्रश्नावली चक्र, नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र, राम श्लोकी प्रश्नावली, श्रीगणेश प्रश्नावली चक्र आदि। इन यंत्रों की सहायता से हम अपने मन में उठ रहे सवाल, हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते है। इन्ही में से एक श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के बारे में आज आपको बता रहे है।

हिंदू धर्म में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना गया है अर्थात सभी मांगलिक कार्यों में सबसे पहले श्रीगणेश की ही पूजा की जाती है। श्रीगणेश की पूजा के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के माध्यम से आप अपने जीवन की परेशानियों व सवालों का हल आसानी से पा सकते हैं। यह बहुत ही चमत्कारी यंत्र है।

उपयोग विधि

जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है वो पहले पांच बार ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र का जप करें। इसके बाद आंखें बंद करके अपना सवाल पूछें और भगवान श्रीगणेश का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने अपने प्रश्न का उत्तर समझें।

1- आप जब भी समय मिले राम नाम का जप करें। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।
2- आप जो कार्य करना चाह रहे हैं, उसमें हानि होने की संभावना है। कोई दूसरा कार्य करने के बारे में विचार           करें। गाय को चारा खिलाएं।
3- आपकी चिंता दूर होने का समय आ गया है। कष्ट मिटेंगे और सफलता मिलेगी। आप रोज पीपल की पूजा            करें।
4- आपको लाभ प्राप्त होगा। परिवार में वृद्धि होगी। सुख संपत्ति प्राप्त होने के योग भी बन रहे हैं। आप कुल              देवता की पूजा करें।
5- आप शनिदेव की आराधना करें। व्यापारिक यात्रा पर जाना पड़े तो घबराएं नहीं। लाभ ही होगा।
6- रोज सुबह भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। महीने के अंत तक आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी।
7- पैसों की तंगी शीघ्र ही दूर होगी। परिवार में वृद्धि होगी। स्त्री से धन प्राप्त होगा।
8- आपको धन और संतान दोनों की प्राप्ति के योग बन रहे हैं। शनिवार को शनिदेव की पूजा करने से आपको           लाभ होगा।
9- आपकी ग्रह दिशा अनुकूल चल रही है। जो वस्तु आपसे दूर चली गई है वह पुन: प्राप्त होगी।
10- शीघ्र ही आपको कोई प्रसन्नता का समाचार मिलने वाला है। आपकी मनोकामना भी पूरी होगी। प्रतिदिन              पूजन करें।
11- यदि आपको व्यापार में हानि हो रही है तो कोई दूसरा व्यापार करें। पीपल पर रोज जल चढ़ाएं। सफलता             मिलेगी।
12- राज्य की ओर से लाभ मिलेगा। पूर्व दिशा आपके लिए शुभ है। इस दिशा में यात्रा का योग बन सकता है।              मान-सम्मान प्राप्त होगा।
13- कुछ ही दिनों बाद आपका श्रेष्ठ समय आने वाला है। कपड़े का व्यवसाय करेंगे तो बेहतर रहेगा। सब कुछ            अनुकूल रहेगा।
14- जो इच्छा आपके मन में है वह पूरी होगी। राज्य की ओर से लाभ प्राप्ति का योग बन रहा है। मित्र या भाई से          मिलाप होगा।
15- आपके सपने में स्वयं को गांव जाता देंखे तो शुभ समाचार मिलेगा। पुत्र से लाभ मिलेगा। धन प्राप्ति के योग            भी बन रहे हैं।
16- आप देवी मां पूजा करें। मां ही सपने में आकर आपका मार्गदर्शन करेंगी। सफलता मिलेगी।
17- आपको अच्छा समय आ गया है। चिंता दूर होगी। धन एवं सुख प्राप्त होगा।
18- यात्रा पर जा सकते हैं। यात्रा मंगल, सुखद व लाभकारी रहेगी। कुलदेवी का पूजन करें।
19- आपके समस्या दूर होने में अभी करीब डेढ़ साल का समय शेष है। जो कार्य करें माता-पिता से पूछकर करें।         कुल देवता व ब्राह्मण की सेवा करें।
20- शनिवार को शनिदेव का पूजन करें। गुम हुई वस्तु मिल जाएगी। धन संबंधी समस्या भी दूर हो जाएगी।
21- आप जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता मिलेगी। विदेश यात्रा के योग भी बन रहे हैं। आप श्रीगणेश का पूजन         करें।
22- यदि आपके घर में क्लेश रहता है तो रोज भगवान की पूजा करें तथा माता-पिता की सेवा करें। आपको शांति        का अनुभव होगा।
23- आपकी समस्याएं शीघ्र ही दूर होंगी। आप सिर्फ आपके काम में मन लगाएं और भगवान शंकर की पूजा              करें।
24- आपके ग्रह अनुकूल नहीं है इसलिए आप रोज नवग्रहों की पूजा करें। इससे आपकी समस्याएं कम होंगी              और लाभ मिलेगा।
25- पैसों की तंगी के कारण आपके घर में क्लेश हो रहा है। कुछ दिनों बाद आपकी यह समस्या दूर जाएगी।              आप मां लक्ष्मी का पूजन रोज करें।
26- यदि आपके मन में नकारात्मक विचार आ रहे हैं तो उनका त्याग करें और घर में भगवान सत्यनारायण का            कथा करवाएं। लाभ मिलेगा।
27- आप जो कार्य इस समय कर रहे हैं वह आपके लिए बेहतर नहीं है इसलिए किसी दूसरे कार्य के बारे में                विचार करें। कुलदेवता का पूजन करें।
28- आप पीपल के वृक्ष की पूजा करें व दीपक लगाएं। आपके घर में तनाव नहीं होगा और धन लाभ भी होगा।
29- आप प्रतिदिन भगवान विष्णु, शंकर व ब्रह्मा की पूजा करें। इससे आपको मनचाही सफलता मिलेगी और घर        में सुख-शांति रहेगी।
30- रविवार का व्रत एवं सूर्य पूजा करने से लाभ मिलेगा। व्यापार या नौकरी में थोड़ी सावधानी बरतें। आपको              सफलता मिलेगी।
31- आपको व्यापार में लाभ होगा। घर में खुशहाली का माहौल रहेगा और सबकुछ भी ठीक रहेगा। आप छोटे             बच्चों को मिठाई बांटें।
32- आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। सब कुछ ठीक हो रहा है। आपकी चिंता दूर होगी। गाय को चारा खिलाएं।
33- माता-पिता की सेवा करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं व भगवान श्रीराम की पूजा करें। आपकी हर अभिलाषा            पूरी होगी।
34- मनोकामनाएं पूरी होंगी। धन-धान्य एवं परिवार में वृद्धि होगी। कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाएं।
35- परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं है। जो भी करें सोच-समझ कर और अपने बुजुर्गो की राय लेकर ही करें।          आप भगवान दत्तात्रेय का पूजन करें।
36- आप रोज भगवान श्रीगणेश को दुर्वा चढ़ाएं और पूजन करें। आपकी हर मुश्किल दूर हो जाएंगी। धैर्य बनाएं           रखें।
37- आप जो कार्य कर रहे हैं वह जारी रखें। आगे जाकर आपको इसी में लाभ प्राप्त होगा। भगवान विष्णु का              पूजन करें।
38- लगातार धन हानि से चिंता हो रही है तो घबराइए मत। कुछ ही दिनों में आपके लिए अनुकूल समय आने              वाला है। मंगलवार को हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करें।
39- आप भगवान सत्यनारायण की कथा करवाएं तभी आपके कष्टों का निवारण संभव है। आपको सफलता भी          मिलेगी।
40- आपके लिए हनुमानजी का पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा। खेती और व्यापार में लाभ होगा तथा हर क्षेत्र में सफलता        मिलेगी।
41- आपको धन की प्राप्ति होगी। कुटुंब में वृद्धि होगी एवं चिंताएं दूर होंगी। कुलदेवी का पूजन करें।
42- आपको शीघ्र सफलता मिलने वाली है। माता-पिता व मित्रों का सहयोग मिलेगा। खर्च कम करें और गरीबों            का दान करें।
43- रुका हुआ कार्य पूरा होगा। धन संबंधी समस्याएं दूर होंगी। मित्रों का सहयोग मिलेगा। सोच-समझकर                  फैसला लें। श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
44- धार्मिक कार्यों में मन लगाएं तथा प्रतिदिन पूजा करें। इससे आपको लाभ होगा और बिगड़ते काम बन                  जाएंगे।
45- धैर्य बनाएं रखें। बेकार की चिंता में समय न गवाएं। आपको मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी। ईश्वर का               चिंतन करें।
46- धार्मिक यात्रा पर जाना पड़ सकता है। इसमें लाभ मिलने की संभावना है। रोज गायत्री मंत्र का जप करें।
47- प्रतिदिन सूर्य को अध्र्य दें और पूजन करें। आपको शत्रुओं का भय नहीं सताएगा। आपकी मनोकामना पूरी            होगी।
48- आप जो कार्य कर रहे हैं वही करते रहें। पुराने मित्रों से मुलाकात होगी जो आपके लिए फायदेमंद रहेगी।               पीपल को रोज जल चढ़ाएं।
49- अगर आपकी समस्या आर्थिक है तो आप रोज श्रीसूक्त का पाठ करें और लक्ष्मीजी का पूजा करें। आपकी             समस्या दूर होगी।
50- आपका हक आपको जरुर मिलेगा। आप घबराएं नहीं बस मन लगाकर अपना काम करें। रोज पूजा अवश्य         करें।
51- आप जो व्यापार करना चाहते हैं उसी में सफलता मिलेगी। पैसों के लिए कोई गलत कार्य न करें। आप रोज          जरुरतमंद लोगों को दान-पुण्य करें।
52- एक महीने के अंदर ही आपकी मुसीबतें कम हो जाएंगी और सफलता मिलने लगेगी। आप कन्याओं को              भोजन कराएं।
53- यदि आप विदेश जाने के बारे में सोच रहे हैं तो अवश्य जाएं। इसी में आपको सफलता मिलेगी। आप                   श्रीगणेश का आराधना करें।
54- आप जो भी कार्य करें किसी से पुछ कर करें अन्यथा हानि हो सकती है। विपरीत परिस्थिति से घबराएं नहीं।           सफलता अवश्य मिलेगी।
55- आप मंदिर में रोज दीपक जलाएं, इससे आपको लाभ मिलेगा और मनोकामना पूरी होगी।
56- परिजनों की बीमारी के कारण चिंतित हैं तो रोज महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। कुछ ही दिनों में आपकी यह        समस्या दूर हो जाएगी।
57- आपके लिए समय अनुकूल नहीं है। अपने कार्य पर ध्यान दें। प्रमोशन के लिए रोज गाय को रोटी खिलाएं।
58- आपके भाग्य में धन-संपत्ति आदि सभी सुविधाएं हैं। थोड़ा धैर्य रखें व भगवान में आस्था रखकर लक्ष्मीजी को         नारियल चढ़ाएं।
59- जो आप सोच रहे हैं वह काम जरुर पूरा होगा लेकिन इसमें किसी का सहयोग लेना पड़ सकता है। आप              शनिदेव की उपासना करें।
60- आप अपने परिजनों से मनमुटाव न रखें तो ही आपको सफलता मिलेगी। रोज हनुमानजी के मंदिर में                  चौमुखी दीपक लगाएं।
61- यदि आप अपने करियर को लेकर चिंतित हैं तो श्रीगणेश की पूजा करने से आपको लाभ मिलेगा।
62- आप रोज शिवजी के मंदिर में जाकर एक लोटा जल चढ़ाएं और दीपक लगाएं। आपके रुके हुए काम हो               जाएंगे।
63- आप जिस कार्य के बारे में जानना चाहते हैं वह शुभ नहीं है उसके बारे में सोचना बंद कर दें। नवग्रह की पूजा        करने से आपको सफलता मिलेगी।
64- आप रोज आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं। आपकी हर समस्या का निदान स्वत: ही हो                जाएगा।

1 = 2 = 3 = 4 = 5 = 6 = 7 = 8


16= 15= 14 = 13 = 12 = 11 =10 = 9


17 =18 = 19 = 20 = 21 = 22 =23 = 24


32 =31 = 30 = 29 = 28 = 27 =26 = 25


33 =34 = 35 = 36 = 37 = 38 =39 = 40


48 =47 = 46 = 45 = 44 = 43 =42 = 41


49 =50 = 51 = 52 = 53 = 54 =55 = 56


64 =63 = 62 =61 = 60 = 59 =58 = 57
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4>डाकिनी :: एक प्रचंड शक्ति

तंत्र जगत में डाकिनी का नाम अति प्रचलित है |सामान्यजन भी इस नाम से परिचित हैं |डाकिनी नाम आते ही एक उग्र स्वरुप की भावना मष्तिष्क में उत्पन्न होती है |अथवा एक भयानक स्वरुप और गुण की महिला की आकृति उभरती है जो पैशाचिक गुण रखती है |वास्तव में यह ऊर्जा का एक अति उग्र स्वरुप है अपने सभी रूपों में |डाकिनी की कई परिभाषाएं हैं |डाकिनी का अर्थ है --ऐसी शक्ति जो "डाक ले जाए "|यह ध्यान रखले लायक है की प्राचीनकाल से और आज भी पूर्व के देहातों में डाक ले जाने का अर्थ है -चेतना का किसी भाव की आंधी में पड़कर चकराने लगना और सोचने समझने की क्षमता का लुप्त हो जाना |यह शक्ति मूलाधार के शिवलिंग का भी आधार है |
तंत्र में काली को भी डाकिनी कहा जाता है यद्यपि डाकिनी काली की शक्ति के अंतर्गत आने वाली एक अति उग्र शक्ति है |यह काली की उग्रता का प्रतिनिधित्व करती हैं और इनका स्थान मूलाधार के ठीक बीच में माना जाता है |डाकिनी पृथ्वी की सतह पर क्रियाशील शक्तियों में से सर्वाधिक शक्तिशाली एक शक्ति है जबकि काली ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक शक्तिशाली शक्तियों में से एक |डाकिनी ,काली का पृथ्वी की सतह पर एक स्वरुप है जो उनकी समस्त उग्रता के साथ उपस्थित है |यह प्रकृति की सर्वाधिक उग्र शक्ति है |यह समस्त विध्वंश और विनाश की मूल हैं ,|इन्ही के कारण काली को अति उग्र देवी कहा जाता है जबकि काली सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति की भी मूल देवी हैं |

जिस प्रकार भैरव एक उग्र शक्ति हैं उसी तरह समान ऊर्जा स्त्री रूप में डाकिनी के पास है |यह कहा जाए की यह और अधिक उग्र है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी |इसलिए इसकी साधना की हिम्मत कोई कोई ही साधक जूता पाता है और गलतियों पर अथवा शक्ति सँभालने की क्षमता न होने पर ख़तरा हो जाता है |वैसे भी यह खुद को जल्दी किसी के नियंत्रण में नहीं आने देती और तीब्र प्रतिक्रिया करती है |तंत्र में डाकिनी की साधना स्वतंत्र रूप से भी होती है और माना जाता है की यदि डाकिनी सिद्ध हो जाए तो काली की सिद्धि आसान हो जाती है और काली की सिद्धि अर्थात मूलाधार की सिद्धि हो जाए तो अन्य चक्र अथवा अन्य देवी-देवता आसानी से सिद्ध हो सकते हैं कम प्रयासों में |इस प्रकार सर्वाधिक कठिन डाकिनी नामक काली की शक्ति की सिद्धि ही है |

डाकिनी नामक देवी की साधना अघोरपंथी तांत्रिकों की प्रसिद्द साधना है |हमारे अन्दर क्रूरता ,क्रोध ,अतिशय हिंसात्मक भाव ,नख और बाल आदि की उत्पत्ति डाकिनी की शक्ति से अर्थात तरंगों से होती है |डाकिनी की सिद्धि पर व्यक्ति में भूत-भविष्य-वर्त्तमान जानने की क्षमता आ जाती है ,किसी को नियंत्रित करने की क्षमता ,वशीभूत करने की क्षमता आ जाती है |यह साधक की रक्षा करती है और मार्गदर्शन भी |यह डाकिनी साधक के सामने लगभग काली के ही रूप में अवतरित होती है और स्वरुप उग्र हो सकता है |इस रूप में माधुर्य-कोमलता का अभाव होता है |सिद्धि के समय यह पहले साधक को डराती है ,फिर तरह तरह के मोहक रूपों में भोग के लिए प्रेरित करती है[यद्यपि मूल रूप से यह उग्र और क्रूर शक्ति है ,भ्रम उत्पन्न और लालच के लिए ऐसा कर सकती है ] ,इसके भय और प्रलोभन से बच गए तो सिद्ध हो सकती है |मस्तिष्क को शून्यकर इसके भाव में डूबे बिना यह सिद्ध नहीं होती |इसमें और काली में व्यावहारिक अंतर है जबकि यह काली के अंतर्गत ही आती है |इसे जगाना पड़ता है जबकि काली एक जाग्रत देवी हैं |डाकिनी की साधना में कामभाव की पूर्णतया वर्जना होती है |

तंत्र जगत में एक और डाकिनी की साधना होती है जो अधिकतर वाममार्ग में साधित होती है |यह डाकिनी प्रकृति [पृथ्वी] की ऋणात्मक ऊर्जा से उत्पन्न एक स्थायी गुण है और निश्चित आकृति में दिखाई देती है |इसका स्वरुप सुन्दर और मोहक होता है |यह पृथ्वी पर स्वतंत्र शक्ति के रूप में पाई जाती है |इसकी साधना अघोरियों और कापालिकों में अति प्रचलित है |यह बहुत शक्तिशाली शक्ति है और सिद्ध हो जाने पर साधक की राह बेहद आसान हो जाती है ,यद्यपि साधना में थोड़ी सी चूक होने अथवा साधक के साधना समय में थोडा सा भी कमजोर पड़ने पर उसे ख़त्म कर देती है |यह भूत-प्रेत-पिशाच-ब्रह्म-जिन्न आदि से उन्नत शक्ति होती है |यह कभी-कभी खुद किसी पर कृपा कर सकती है और कभी किसी पर स्वयमेव आसक्त भी हो सकती है |तंत्र कहानियों में इसके किन्ही व्यक्तियों पर आसक्त होने ,विवाह करने और संतान तक उत्पन्न करने की कथाएं मिलती हैं |इसका स्वरुप एक सुन्दर ,गौरवर्णीय ,तीखे नाक नक्श [नाक कुछ लम्बी ]वाली युवती की होती है जो काले कपडे में ही अधिकतर दिखती है |काशी के तंत्र जगत में इसकी साधना ,विचरण और प्रभाव का विवरण मिलता है |इस शक्ति को केवल वशीभूत किया जा सकता है ,इसको नष्ट नहीं किया जा सकता ,यह सदैव व्याप्त रहने वाली शक्ति है जो व्यक्ति विशेष के लिए लाभप्रद भी हो सकती है और हानिकारक भी |इसे नकारात्मक नहीं कहा जा सकता अपितु यह ऋणात्मक शक्ति ही होती है यद्यपि स्वयमेव भी प्रतिक्रिया कर सकती है |सामान्यतया यहनदी-सरोवर के किनारों , घाटों ,शमशानों, तंत्र पीठों ,एकांत साधना स्थलों आदि पर विचरण कर सकती हैं ,जो उजाले की बजाय अँधेरे में होना पसंद करती हैं |इस डाकिनी और मूलाधार की डाकिनी में अंतर होता है |

मूलाधार की डाकिनी व्यक्ति के मूलाधार से जुडी होती है ,कुंडलिनी सुप्त तो वह भी सुप्त |तंत्र मार्ग से कुंडलिनी जगाने की कोसिस पर सबसे पहले इसका ही जागरण होता है |इसकी साधना स्वतंत्र रूप से भी होती है और कुंडलिनी साधना के अलावा भी यह साधित होती है |कुंडलिनी की डाकिनी शक्ति की साधना पर प्रकृति की डाकिनी का आकर्षण हो सकता है और वह उपस्थित हो सकती है, यद्यपि प्रकृति में पाई जाने वाली डाकिनी प्रकृति की स्थायी शक्ति है जिसकी साधना प्रकृति भिन्न होती है किन्तु गुण-भाव समान ही होते हैं |इसमें अनेक मतान्तर हैं की डाकिनी की स्वतंत्र साधना पर काली से सम्बंधित डाकिनी का आगमन होता है अथवा प्रकृति की डाकिनी का ,क्योकि प्रकृति भी तो काली के ही अंतर्गत आता है |वस्तुस्थिति कुछ भी हो किन्तु डाकिनी एक प्रबल शक्ति होती है और यह इतनी सक्षम है की सिद्ध होने पर व्यक्ति की भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही आवश्यकताएं पूर्ण कर सकती है तथा साधना में सहायक हो मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है |
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5> दुःख दारिद्रय निवारक चमत्कारी उपाय ==64 योगिनी तंत्र:-

उपाय के लिए रविपुष्य नक्षत्र (जिस रविवार को पुष्य नक्षत्र हो) चुनिए इस दिन कहीं सिद्ध भैरव जी के मन्दिर से उनके चरणों की कालिमा एकत्र कर लें। इसे स्याही की तरह प्रयोग करना है। एक साफ-सा आयताकार भोजपत्र ले लें। इस पत्र पर यंत्र अंकित करना है। सिरस के वृक्ष की एक लकड़ी से कलम बना लें। यह न मिले तो अनार के वृक्ष की लकड़ी से बना लें।

भोजपत्र पर शतरंज के कोष्ठकों की तरह 64 कोष्ठक बना लें। प्रत्येक कोष्ठक में क्रमशः एक-एक योगिनी का नाम अंकित कर लें। लिखने का क्रम बाएं से दाएं तथा नीचे से ऊपर की ओर रहे, इसका ध्यान रखें। यदि सक्षम हैं तो यह यंत्र तांबे, चांदी अथवा सोने की शीट पर अंकित करवाकर प्राण-प्रतिष्ठा कर लें। 64 योगिनीयों के नाम निम्न प्रकार हैं।

दिव्ययोगिनी, 2. महायोगिनी, 3. सिद्धयोगिनी, 4. गणेश्वरी, 5. प्रेताक्षी, 6. डाकिनी, 7. काली, 8. कालरात्रि, 9. निशाचरी, 10. हुंकारी, 11. रूद्रवैताली, 12. खर्परी, 13. भूतयामिनी, 14. ऊर्ध्वकेशी, 15. विरुपाक्षी, 16. शुष्कांगी, 17. मॉसभोजनी, 18. फेत्कारी, 19. वीरभद्राक्षी, 20. धूम्राक्षी, 21. कलहप्रिया, 22. रक्ता, 23. घाररक्ताक्षी, 24. विरुपाक्षी, 25. भयंकरी, 26. चौरिका, 27. मारिका, 28. चंडी, 29. वाराही, 30. मुंडधारिणी, 31. भैरवी, 32. चक्रिणी, 33. क्रोधा, 34. दुर्मुखी, 35. प्रतवाहिनी, 36. कंटकी, 37. दीर्घलंबौष्ठी, 38. मालिनी, 39. मंत्रयोगिनी, 40. कालाग्रि, 41. मोहिनी, 42. चक्री, 43. कंकाली, 44. भुवनेश्वरी, 45. कुंडलाक्षी, 46. जुही, 47. लक्ष्मी, 48. यमदूती, 49. करालिनी, 50. कौशिकी, 51. भाक्षिणी, 52. यक्षी, 53. कौमारी, 54. यंत्रवाहिनी, 55. विशाला, 56. कामुकी, 57. व्याघ्री, 58. याक्षिणी, 59. प्रेतभूषणी, 60. धूर्जटा, 61. विकटा, 62. घोरा, 63. कपाला, 64. लांगली।

कालरात्रि शुष्कांगी विरुपाक्षी चक्रिणी कालागि यमदूती कामुकी लांगली

काली विरुपाक्षी घाररक्ताक्षी भैरवी मंत्रयोगिनी लक्ष्मी विशाला कपाला

डाकिनी ऊर्ध्वकेशी रक्ता मुंडधारिणी मालिनी जुही यंत्रवाहिनी घोरा

प्रेताक्षी भूतयामिनी कलहप्रिया वाराही दीर्घलंबौष्ठी कुंडलाक्षी कौमारी विकटा

गणेश्वरी खर्परी धूम्राक्षी चंडी कंटकी भुवनेश्वरी यक्षी धूर्जटा

सिद्धयोगिनी रूद्रवैताली वीरभद्राक्षी मारिका प्रतवाहिनी कंकाली भाक्षिणी प्रेतभूषणी

महायोगिनी हुंकारी फेत्कारी चौरिका दुर्मुखी चक्री कौशिकी याक्षिणी

दिव्ययोगिनी निशाचरी मॉसभोजनी भयंकरी क्रोधा मोहिनी करालिनी व्याघ्री

यंत्र के सूखने तक प्रतीक्षा करें। जिस क्रम से नाम अंकित किए थे उसी क्रम से प्रत्येक कोष्ठक में एक चुटकी नागकेसर चढ़ाएं। यथा भक्ति यंत्र की धूप-दीप से पूजा अर्चना करें। अनामिका उंगली का पोर दबाते हुए यह उंगली अब पहले कोष्ठक में रखें तथा इसमें अंकित पहला नाम दिव्ययोगिनी 64 बार ‘‘ॐ दिव्ययोगिनी नमः’’ जपें। दूसरी बार दूसरे कोष्ठक पर उंगली रखकर 64 बार दूसरा नाम महायोगिनी जपें, ‘‘ॐ महायोगिनी नमः’’। इसी प्रकार यंत्र के प्रत्येक कोष्ठक में उंगली रखते हुए वह नाम 64-64 बार जपें। अन्त 11 माला ‘‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्री हंसौः चतुःषश्ठियोगिनोभ्यो नमः’’ जप करके यंत्र को ऐसे ही सुरक्षित रख लें। अगले दिन यंत्र बनाने की प्रक्रिया छोड़कर 64 कोष्ठकों में उंगली रखकर 64-64 बार नाम जप करें और अन्त में योगिनी महामंत्र की ग्यारह माला जप करें। यह तांत्रिक अनुष्ठान 64 दिन चलेगा। चौसठवें अर्थात् अन्तिम दिन मंत्र जप के बाद योगिनी महामंत्र की एक माला से हवन करें। हवन सामग्री में कमलगट्टे, गूगल, जौ, बताशे, घृत तथा पंचमेवा अवश्य मिला लें। इन चौसठ दिनों में नित्य गुग्गुल धूनी करें। शान्तिकुज हरिद्वार में गुग्गुल की अगरबत्ती मिलती है यह उपयोग करें तो थोड़ी सुविधा हो जाएगी। अन्तिम दिन एक, दो अथवा अधिक, अपने सामर्थ्य अनुसार सौभाग्यशाली स्त्रीयों को भोजन दक्षिणा से प्रसन्न करके उनका आशीष लें।

यंत्र को सुन्दर सा फ्रेम करवाकर अपने आवास, दुकान फैक्ट्री आदि में उत्तर दिशा वाली दीवार में रख दें अथवा टांग दें। पुष्प की माला सदैव इस यंत्र पर चढ़ी रहे। यंत्र पर चढ़े हुए नागकेसर एक लाल कपड़े में बांधकर यंत्र के पास ही रख लें। सम्भव हो तो नित्य योगिनी महामंत्र की एक माला जप करें।

आप कुछ ही समय में चमत्कारी रुप से अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण में परिवर्तन अनुभव करने लगेगें। ऋण का भार, व्यापार अथवा अन्य कार्य का अकस्मात् बाधित हो जाना, धन संपदा के लिए लोगों से बैर, भूमि-भवन आदि के क्रय विक्रय में व्यवधान आदि अनेक बातों से आप अपने मुक्त कर शान्तिमय जीवन जीने लगेंगे।

यह उपाय सरलतम उपायों की श्रंखला में कठिन अवश्य है परन्तु यदि संयम से कर लिया जाए तो बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध होता है। समय के अभाव में जो साधक यह करने में असमर्थ में वह यह यंत्र बनाकर रख लें तथा योगिनी महामंत्र की एक माला नित्य जप करें। पूजा के समय यंत्र को गूगुल की धूनी अवश्य दें। इस सरल उपाय से भी कई लोगों को लाभ पहुचा है। मै बार-बार लिख रहा हॅू कि लाभ के पीछे आपके प्रारब्ध का भी महत्वपूर्ण योगदान है।
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6>चंडिका प्रयोग

प्रस्तुत साधना तब करे जब जीवन पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया हो.कोई मार्ग नज़र न आ रहा हो.दरिद्रता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हो.क्युकी ये प्रयोग मारण प्रयोग है,अरे नहीं किसी व्यक्ति का नहीं, अपने कष्टो पर भी तो मारण किया जा सकता है न

दरिद्रता,रोग,गृह क्लेश और भी न जाने क्या क्या कष्ट है जीवन में,जो आपको रात दिन तील तील मारते रहते है,इससे पहले कि ये आपको पूरी तरह मारदे आप कर ही दीजिये इन पर चंडिका प्रयोग।

ये प्रयोग तीन दिन का है,किसी भी रविवार या अमावस्या कि रात्रि १२ बजे इसे किया जा सकता सकता है.दक्षिण कि और मुख कर बैठ जाये,आसन वस्त्र लाल हो तथा जाप होगा रुद्राक्ष कि माला से.सामने महाकाली का कोई भी चित्र स्थापित करे लाल वस्त्र पर.माँ का सामान्य पूजन करे,तील के तेल का दीपक हो.भोग में माँ को गूढ़ अर्पण करे.रक्त पुष्पो से पूजन करे.इसके बाद २१ माला आप मंत्र का जाप करे.भोग नित्य स्वयं खा ले.अंतिम दिन जाप के बाद घी में कालीमिर्च तथा काले तील मिलाकर १०८ आहुति प्रदान करे,तथा अंत में एक निम्बू पर मंत्र को २१ बार पड़कर फुक मार दे.और मंत्र पड़ते हुए ही निम्बू अग्नि कुंड में डाल दे.नित्य पूजन के बाद भी स्नान कर लिया करे.

मंत्र: क्रीं ह्रीं क्रीं महाकाली चण्डिके आपदउद्दारिणी अनंगमालिनि सर्वोपद्रव नाशिनी क्रीं ह्रीं क्रीं फट।

मित्रो इस प्रकार ये प्रयोग पूर्ण होता है,जो आपके जीवन से समस्त शोक दुःख आदि को दूर कर देगा।
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7>तंत्र, मंत्र, यंत्र और योग साधना का लाभ..

हिंदू धर्म में हजारों तरह की साधनाओं का वर्णन मिलता है। साधना से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। व्यक्ति सिद्धियां इसलिए प्राप्त करना
चाहता है, क्योंकि या तो वह उससे सांसारिक लाभ प्राप्त करना चाहता है या फिर आध्यात्मिक लाभ।
मूलत:---------
साधना के चार प्रकार माने जा सकते हैं- तंत्र साधना, मंत्र साधना, यंत्र साधना और योग साधना। तीनों ही तरह की साधना के कई उप प्रकार हैं। आओ जानते हैं साधना के तरीके और उनसे प्राप्त होने वाला लाभ...

  तांत्रिक साधना...

तांत्रिक साधना दो प्रकार की होती है- एक वाम मार्गी तथा दूसरी दक्षिण मार्गी। वाम मार्गी साधना बेहद कठिन है। वाम मार्गी तंत्र साधना में 6 प्रकार के कर्म बताए गए हैं जिन्हें षट् कर्म कहते हैं।

तांत्रिक साधना दो प्रकार की होती है-

एक वाम मार्गी तथा दूसरी दक्षिण मार्गी। वाम मार्गी साधना बेहद कठिन है। वाम मार्गी तंत्र साधना में 6 प्रकार के कर्म बताए गए हैं जिन्हें षट् कर्म कहते हैं।

शांति, वक्ष्य, स्तम्भनानि, विद्वेषणोच्चाटने तथा।
गोरणों तनिसति षट कर्माणि मणोषणः॥

अर्थात शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छ: तांत्रिक षट् कर्म।

इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:-

मारण मोहनं स्तम्भनं विद्वेषोच्चाटनं वशम्‌।
आकर्षण यक्षिणी चारसासनं कर त्रिया तथा॥

मारण, मोहनं, स्तम्भनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये 9 प्रयोग हैं।
रोग कृत्वा गृहादीनां निराण शन्तिर किता।
विश्वं जानानां सर्वेषां निधयेत्व मुदीरिताम्‌॥
पूधृत्तरोध सर्वेषां स्तम्भं समुदाय हृतम्‌।
स्निग्धाना द्वेष जननं मित्र, विद्वेषण मतत॥
प्राणिनाम प्राणं हरपां मरण समुदाहृमत्‌।

जिससे रोग, कुकृत्य और ग्रह आदि की शांति होती है, उसको शांति कर्म कहा जाता है और जिस कर्म से सब प्राणियों को वश में किया जाए, उसको वशीकरण प्रयोग कहते हैं तथा जिससे प्राणियों की प्रवृत्ति रोक दी जाए, उसको स्तम्भन कहते हैं तथा दो प्राणियों की परस्पर प्रीति को छुड़ा देने वाला नाम विद्वेषण है और जिस कर्म से किसी प्राणी को देश आदि से पृथक कर दिया जाए, उसको उच्चाटन प्रयोग कहते हैं तथा जिस कर्म से प्राण हरण किया जाए, उसको मारण कर्म कहते हैं।

मंत्र साधना भी कई प्रकार की होती है। मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है। मंत्र का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है तब वह सिद्ध होने लगता है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।

मुख्यत: 3 प्रकार के मंत्र होते हैं- 1. वैदिक मंत्र, 2. तांत्रिक मंत्र और 3. शाबर मंत्र।

मंत्र जप के भेद- 1. वाचिक जप, 2. मानस जप और 3. उपाशु जप।


वाचिक जप में ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है। मानस जप का अर्थ मन ही मन जप करना। उपांशु जप का अर्थ जिसमें जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती। बिलकुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है।

मंत्र नियम :

मंत्र-साधना में विशेष ध्यान देने वाली बात है- मंत्र का सही उच्चारण। दूसरी बात जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्ठान करना है, उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखा जाए। प्रतिदिन के जप से ही सिद्धि होती है।

किसी विशिष्ट सिद्धि के लिए सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के समय किसी भी नदी में खड़े होकर जप करना चाहिए। इसमें किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है। जप का दशांश हवन करना चाहिए और ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन कराना चाहिए।

यंत्र साधना सबसे सरल है। बस यंत्र लाकर और उसे सिद्ध करके घर में रखें लोग तो अपने आप कार्य सफल होते जाएंगे। यंत्र साधना को कवच साधना भी कहते हैं।

यं‍त्र को दो प्रकार से बनाया जाता है- अंक द्वारा और मंत्र द्वारा। यंत्र साधना में अधिकांशत: अंकों से संबंधित यंत्र अधिक प्रचलित हैं। श्रीयंत्र, घंटाकर्ण यंत्र आदि अनेक यंत्र ऐसे भी हैं जिनकी रचना में मंत्रों का भी प्रयोग होता है और ये बनाने में अति क्लिष्ट होते हैं।

इस साधना के अंतर्गत कागज अथवा भोजपत्र या धातु पत्र पर विशिष्ट स्याही से या किसी अन्यान्य साधनों के द्वारा आकृति, चित्र या संख्याएं बनाई जाती हैं। इस आकृति की पूजा की जाती है अथवा एक निश्चित संख्या तक उसे बार-बार बनाया जाता है। इन्हें बनाने के लिए विशिष्ट विधि, मुहूर्त और अतिरिक्त दक्षता की आवश्यकता होती है।

यंत्र या कवच भी सभी तरह की मनोकामना पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं जैसे वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण, धन अर्जन, सफलता, शत्रु निवारण, भूत बाधा निवारण, होनी-अनहोनी से बचाव आदि के लिए यंत्र या कवच बनाए जाते हैं।

दिशा- प्रत्येक यंत्र की दिशाएं निर्धारित होती हैं। धन प्राप्ति से संबंधित यंत्र या कवच पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं तो सुख-शांति से संबंधित यंत्र या कवच पूर्व दिशा की ओर मुंह करके रख जाते हैं। वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण के यंत्र या कवच उत्तर दिशा की ओर मुंह करके, तो शत्रु बाधा निवारण या क्रूर कर्म से संबंधित यंत्र या कवच दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं। इन्हें बनाते या लिखते वक्त भी दिशाओं का ध्यान रखा जाता है।

सभी साधनाओं में श्रेष्ठ मानी गई है योग साधना। यह शुद्ध, सात्विक और प्रायोगिक है। इसके परिणाम भी तुरंत और स्थायी महत्व के होते हैं। योग कहता है कि चित्त वृत्तियों का निरोध होने से ही सिद्धि या समाधि प्राप्त की जा सकती है- 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'।

मन, मस्तिष्क और चित्त के प्रति जाग्रत रहकर योग साधना से भाव, इच्छा, कर्म और विचार का अतिक्रमण किया जाता है। इसके लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार ये 5 योग को प्राथमिक रूप से किया जाता है। उक्त 5 में अभ्यस्त होने के बाद धारणा और ध्यान स्वत: ही घटित होने लगते हैं।

योग साधना द्वार अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति की जाती है। सिद्धियों के प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अपनी सभी तरह की मनोकामना पूर्ण कर सकता है।

जानिए... योग साधना की सात बाधाएं

योग साधना की सात बाधा

योग एक ‍कठिन साधना है। इसका अभ्यास किसी गुरु के सानिध्य में रहकर ही किया जाता है। विभिन्न योगाचार्यों अनुसार अभ्यास के समय कुछ आदतें साधक के समक्ष बाधाएँ उपस्थित कर सकती हैं, जिससे हठ योग साधना में विघ्न उत्पन्न होता हैं। ये आदतें निम्न हैं:- अधिक आहार, अधिक प्रयास, दिखावा, नियम विरुद्ध, लोक-संपर्क तथा चंचलता।

1.अधिक आहार : अधिक आहार की आदत योग में बाधा उत्पन्न करती है। डटकर भोजन करने वाले आलस्य, निद्रा, मोटापा आदि के शिकार बन जाते हैं। यौगिक आहार नियम को जानकर ही आहार करें। आहार संयम होना आवश्यक है।
2.अधिक प्रयास : कुछ अभ्यास ठीक से नहीं हो पाते तब साधक जोर लगाकर अधिक प्रयास से अभ्यास को साधना चाहता है, यह आदत घातक है। शरीर और मन की क्षमता को ध्यान में रखते हुए अपनी ओर से कभी अधिक प्रयास नहीं करना चाहिए।
3.दिखावापन : इसे योगाचार्य प्रजल्प भी कहते हैं। कुछ लोग अपने अभ्यासों के संबंध में लोगों के समक्ष बढ़ा-चढ़ाकर बखान करते हैं। बहुत से अपने अभ्यास की थोड़ी बहुत सफलता का प्रदर्शन भी करते हैं। यही दिखावेपन की आदत योगी को योग से दूर कर देती है। अतः जो भी अभ्यास करें, उसकी चर्चा, जहाँ तक हो सके दूसरों से खासकर अनधिकारी व्यक्तियों से कभी न करें।
4.नियम विरुद्ध : योग के नियम के विरुद्ध है मन से नियम बनाना, इसे नियमाग्रह कहते हैं। बहुत से लोग कुछ खास नियम बना लेते हैं और आग्रह रखते हैं कि उसी के अनुसार चलेंगे। एक अर्थ में यह ठीक है और ऐसा करना भी चाहिए। किन्तु कभी-कभी यह विघ्नकारक भी हो जाता है।

उदाहरणार्थ-

जैसे खाने के नियम बना लेते हैं कि एक फल ही खाऊँगा या सप्ताह में तीन दिन ही खाऊँगा। अभ्यास के नियम कि स्नान के बाद ही अभ्यास करेंगे या सुबह ही करेंगे या किसी खास स्थान में ही करेंगे। बुखार होगा तब भी अभ्यास नहीं छोड़ेगे। इस तरह मनमाने नियम से शरीर और मन को कष्ट होता है जबकि योग कहता है कि मध्यम मार्ग का अनुसरण करो। नियम हो लेकिन सख्‍त न हो। नियमों में लचीलापन बना रहना चाहिए।

5.जन-संपर्क : योग का अभ्यास करने वाले को अधिक जन-संपर्क में नहीं रहना चाहिए। उसे बहस, वाद-विवाद, सांसारिक चर्चा से दूर रहना चाहिए। अधिक जन संपर्क या संग से खानपान की बुरी आदतें भी बनने लगती हैं। अतः जहाँ तक संभव हो लोगों से कम संपर्क रखें।
6.चंचलता : कभी यहाँ, कभी वहाँ, कभी कुछ, कभी कुछ, यह शरीर की चंचल प्रवृत्ति ठीक नहीं होती। शारीरिक चंचलता से मन की चंचलता या मन की चंचलता से शारीरिक चंचलता उत्पन्न होती है। अतः शरीर को भी स्थिर रखें, अधिक दौड़धूप न करें और मन को भी शांत व स्थिर रखें। अधिक इधर-उधर की न सोचें।

7.संकल्प और धैर्य : संकल्पवान और धैर्यशील व्यक्ति ही योग में सफल हो सकता। संकल्प और धैर्य के अभाव में योग ही नहीं किसी भी विद्या या कार्य में सफलता अर्जित नहीं की जा सकती। संकल्प और धैर्यशीलता से ही सभी तरह की बाधाओं को पार किया जा सकता है अत: संकल्प और धीरज का होना बहुत जरूरी है।

इस प्रकार उपर्युक्त यह सात विघ्नकारक तत्व हैं, जिनसे योगाभ्यास में बाधा उत्पन्न होती है। सच्चा साधक इन विघ्नों से सदा दूर रहकर और अपनी आदतों में सुधार कर अपने योगाभ्यास को सफल बनाता है।
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8>काले जादू और बुरी नजर से बचाती है ये साधारण लगने वाली चीजे

कालेजादू और बुरी दृष्टि से बचाने के लिए वास्तुशास्त्र में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ने के लिए या किसी भी प्रकार के वास्तु दोष को दूर करने के लिए घर की छत पर उत्तर पूर्व दिशा में पांच तुलसी का पौधा लगाना चाहिए। पांच नहीं तो कम से कम एक तुलसी का पौधा इस दिशा में जरुर लगाएं। इससे घर में आने वाले नकारात्मक प्रभाव में कमी आती है। वास्तुविज्ञान में बताया गया है बाहर से घर में आने वाले लोग भी कई बार नकारात्मक उर्जा लेकर आते हैं। जिनके घर के मुख्य द्वार पर तुलसी का पौधा होता है उनके घर में इस तरह के नकारात्मक उर्जा का प्रवेश नहीं हो पाता है।

सूरज भगवन की तस्वीर भी शुभ फलदायी होती होती है, पर इन्हे के घर में कहीं भी लगाने से आपके शुभ फल नहीं मिलता है। घोड़े की तस्वीर लगाने के लिए पूर्व दिशा को शुभ माना गया है। सूर्यदेव पूर्व दिशा से उदित होते हैं और उनके रथ में सात अश्व माने गए हैं। माना जाता है कि ऐसी तस्वीरों से घर में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है जो लोगों को स्वस्थ और उर्जावान बनाए रखता है। ऐसी तस्वीरों को उन्नति और सफलता का भी प्रतीक माना गया है।

मेहमानो को जिस कमरे में बिठाते है वंहा श्री कृष्ण की बाललीलाओं वाली तस्वीर और अपने गुरु या किसी महापुरुष जिनसे आपको प्रेरणा मिलती हो उनकी तस्वीर लगाना चाहिए। ऐसी तस्वीरों से आपको सकारात्मक उर्जा का लाभ मिलता है। वास्तु सिद्घांत के अनुसार घर के अग्नेय कोण यानी (दक्षिण पूर्व) हिस्से में हवन की तस्वीर लगानी चाहिए। लेकिन अगर आपके घर में शयन कक्ष आग्नेय कोण में है तब इस तस्वीर की बजाय समुद्र की तस्वीर लगाएं। लेकिन ध्यान रखें समुद्र शांत हो।
वास्तु विज्ञान में शंख का बड़ा महत्व बताया गया है। घर में जब भी विशेष पूजा जैसे होली दिवाली, रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी, नवरात्रे के दिन शंख को पूजा स्थल में रखकर इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। अगर संभव हो तो शाम ढ़लने से पहले और सूर्योदय के समय शंख बजाएं इससे घर और आपके आस-पास का वातावरण शुद्घ और उर्जावान बना रहता है।

घर के बहार नकारात्मक उर्जा और वास्तुदोष से मुक्त रखने के लिए मुख्य द्वार पर स्वास्तिक या ओम लगाना चाहिए। गणेश जी की मूर्ति पर मुख्य द्वार पर लगाई जाती है लेकिन गणेश जी की मूर्ति लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि गणेश जी का मुख घर के अंदर की तरफ हो।

जिन घर में रसोई घर दक्षिण पूर्व में नहीं हो तब वास्तुदोष को दूर करने के लिए रसोई के उत्तर पूर्व यानी ईशान कोण में सिंदूरी गणेश जी की तस्वीर लगानी चाहिए।
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9>गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है

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१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रुभी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.
२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.
३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.
४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.
काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
रक्तगुंजा: गुंजा का बीज होता है, जो लाल रंग का होता है। इस पर काले रंग का छोटा सा बिंदू बना होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति व उसे चिरकाल तक स्थिर रखने हेतु गुंजा का प्रयोग किया जाता है। तंत्रशास्त्र में इसका कई रूपों में प्रयोग होता है।

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गुंजा

गुंजा की लता पर लगी फली में बीज

गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है।

गुंजा गुंजा दो प्रकार की होती है।विभिन्न भाषाओं में नामअंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद

हानिकारक प्रभाव

पाश्चात्य मतानुसार गुंजा के फलों के सेवन से कोई हानि नहीं होती है। परन्तु क्षत पर लगाने से विधिवत कार्य करती है। सुश्रुत के मत से इसकी मूल गणना है।

गुंजा को आंख में डालने से आंखों में जलन और पलकों में सूजन हो जाती है।

गुण

दोनों गुंजा, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), बलवर्द्धक (ताकत बढ़ाने वाला), ज्वर, वात, पित्त, मुख शोष, श्वास, तृषा, आंखों के रोग, खुजली, पेट के कीड़े, कुष्ट (कोढ़) रोग को नष्ट करने वाली तथा बालों के लिए लाभकारी होती है। ये अन्यंत मधूर, पुष्टिकारक, भारी, कड़वी, वातनाशक बलदायक तथा रुधिर विकारनाशक होता है। इसके बीज वातनाशक और अति बाजीकरण होते हैं। गुन्जा से वासिकर्न भि कर सक्ते ही ग्न्जा

अंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद============================================================

चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा

चमत्कारी है गुंजा
तांत्रिक जड़ीबूटियां भाग -9

गुंजा एक फली का बीज है। इसको धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसकी बेल काफी कुछ मटर की तरह ही लगती है किन्तु अपेक्षाकृत मजबूत काष्ठीय तने वाली। इसे अब भी कहीं कहीं आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक सुनार इसे सोना तोलने के काम में लेते थे क्योंकि इनके प्रत्येक दाने का वजन लगभग बराबर होता है करीब 120 मिलीग्राम। ये हमारे जीवन में कितनी बसी है इसका अंदाज़ा मुहावरों और लोकोक्तियों में इसके प्रयोग से लग जाता है।

यह तंत्र शास्त्र में जितनी मशहूर है उतनी ही आयुर्वेद में भी। आयुर्वेद में श्वेत गूंजा का ही अधिक प्रयोग होता है औषध रूप में साथ ही इसके मूल का भी जो मुलैठी के समान ही स्वाद और गुण वाली होती है। इसीकारण कई लोग मुलैठी के साथ इसके मूल की भी मिलावट कर देते हैं।

वहीं रक्त गूंजा बेहद विषैली होती है और उसे खाने से उलटी दस्त पेट में मरोड़ और मृत्यु तक सम्भव है। आदिवासी क्षेत्रों में पशु पक्षी मारने और जंगम विष निर्माण में अब भी इसका प्रयोग होता है।

गुंजा की तीन प्रजातियां मिलती हैं:-

1• रक्त गुंजा: लाल काले रंग की ये प्रजाति भी तीन तरह की मिलती है जिसमे लाल और काले रंगों का अनुपात 10%, 25% और 50% तक भी मिलता है।

ये मुख्यतः तंत्र में ही प्रयोग होती है।

श्वेत गुंजा • श्वेत गुंजा में भी एक सिरे पर कुछ कालिमा रहती है। यह आयुर्वेद और तंत्र दोनों में ही सामान रूप से प्रयुक्त होती है। ये लाल की अपेक्षा दुर्लभ होती है।

काली गुंजा: काली गुंजा दुर्लभ होती है, आयुर्वेद में भी इसके प्रयोग लगभग नहीं हैं हाँ किन्तु तंत्र प्रयोगों में ये बेहद महत्वपूर्ण है।

इन तीन के अलावा एक अन्य प्रकार की गुंजा पायी जाती है पीली गुंजा ये दुर्लभतम है क्योंकि ये कोई विशिष्ट प्रजाति नहीं है किन्तु लाल और सफ़ेद प्रजातियों में कुछ आनुवंशिक विकृति होने पर उनके बीज पीले हो जाते हैं। इस कारण पीली गूंजा कभी पूर्ण पीली तो कभी कभी लालिमा या कालिमा मिश्रित पीली भी मिलती है।

इस चमत्कारी वनस्पति गुंजा के कुछ प्रयोग:-

1• सम्मान प्रदायक :

शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा।

2• कारोबार में बरकत

किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।

3"• ज्ञान-बुद्धि वर्धक :

(क) गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है।

(ख) यदि सफेद गुंजा के 11 या 21 दाने अभिमंत्रित करके विद्यार्थियों के कक्ष में उत्तर पूर्व में रख दिया जाये तो एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में लाभ होता है।

4• वर-वधू के लिए :

विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है।

5• पुत्रदाता :

शुभ मुहुर्त में श्वेत गुंजा की जड़ लाकर दूध से धोकर, सफेद चन्दन पुष्प से पूजा करके सफेद धागे में पिरोकर। “ऐं क्षं यं दं” मंत्र के ग्यारह हजार जाप करके स्त्री या पुरूष धारण करे तो संतान सुख की प्राप्ती होती है।

6• वशीकरण -

(क) आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

(ख) गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

( गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

7• विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है।

8• विष-निवारण :
गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये। यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें।

इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

9• दिव्य दृष्टि :-

(क) अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं।

(ख) गुप्त धन दर्शन :

अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

10• शत्रु में भय उत्पन्न :

गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

11• शत्रु दमन प्रयोग :

यदि लड़ाई झगड़े की नौबत हो तो काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा।

12• रोग - बाधा

(क) कुष्ठ निवारण प्रयोग :

गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

(ख)अंधापन समाप्त :

गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं।नेत्रों की सफाई होती है आँखों का जाल कटता है।

देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

(ग) वाजीकरण:

श्वेत गुंजा की जड को गाय के शुद्ध घृत में पीसकर लेप तैयार करें। यह लेप शिश्न पर मलने से कामशक्ति की वृद्धि के साथ स्तंभन शक्ति में भी वृद्धि होती है।

13: नौकरी में बाधा
राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।

**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:

1• काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।

2• दिवाली के दिन अपने गल्‍ले के नीचे काली गुंजा जंगली बेल के दाने डालने से व्‍यवसाय में हो रही हानि रूक जाती है।

3• दिवाली की रात घर के मुख्‍य दरवाज़े पर सरसों के तेल का दीपक जला कर उसमें काली गुंजा के 2-4 दाने डाल दें। ऐसा करने पर घर सुरक्षित और समृद्ध रहता है।

4• होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।

5• घर से अलक्ष्मी दूर करने का लघु प्रयोग-

ध्यानमंत्र :

ॐ तप्त-स्वर्णनिभांशशांक-मुकुटा रत्नप्रभा-भासुरीं ।
नानावस्त्र-विभूषितां त्रिनयनां गौरी-रमाभ्यं युताम् ।
दर्वी-हाटक-भाजनं च दधतीं रम्योच्चपीनस्तनीम् ।
नित्यं तां शिवमाकलय्य मुदितां ध्याये अन्नपूर्णश्वरीम् ॥

मन्त्र :

ॐ ह्रीम् श्रीम् क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि मामाभिमतमन्नं देहि-देहि अन्नपूर्णों स्वाहा ।


विधि :

जब रविवार या गुरुवार को पुष्प नक्षत्र हो या नवरात्र में अष्टमी के दिन या दीपावली की रात्रि या अन्य किसी शुभ दिन से इस मंत्र की एक माला रुद्राक्ष माला से नित्य जाप करें । जाप से पूर्व भगवान श्रीगणेश जी का ध्यान करें तथा भगवान शिव का ध्यान कर नीचे दिये ध्यान मंत्र से माता अन्नपूर्णा का ध्यान करें ।

इस मंत्र का जाप दुकान में गल्ले में सात काली गुंजा के दाने रखकर शुद्ध आसन, (कम्बल आसन, या साफ जाजीम आदि ) पर बैठकर किया जाए तो व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ महसूस होने गेगा ।

6• कष्टों से छुटकारे हेतु

यदि संपूर्ण दवाओं एवं डाक्टर के इलाज के बावजूद भी यदि घुटनों और पैरों का दर्द दूर नहीं हो रहा हो तो रवि पुष्य नक्षत्र, शनिवार या शनि आमवस्या के दिन यह उपाय करें। प्रात:काल नित्यक्रम से निवृत हो स्नानोपरांत लोहे की कटोरी में श्रद्धानुसार सरसों का तेल भरें। 7 चुटकी काले तिल, 7 लोहे की कील और 7 लाल और 7 काली गुंजा उसमें डाल दें। तेल में अपना मुंह देखने के बाद अपने ऊपर से 7 बार उल्टा उसारकर पीपल के पेड़ के नीचे इस तेल का दीपक जला दें 21 परिक्रमा करें और वहीं बैठकर 108 बार

ऊँ शं विधिरुपाय नम:।।

इस मंत्र का जाप करें। ऐसा 11 शनिवार करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।


पीली गुंजा:

1• पीले रंग की गुंजा के बीज ,हल्दी की गांठे, सात कौडियों की पूजा अर्चना करके श्री लक्ष्मीनारायण भगवान के मंत्रों से अभिमंत्रित करके पूजा स्थान में रखने से दाम्पत्य सुख एवं परिवार,मे एकता तथा आर्थिक व्यावसायिक सिद्धि मिलती है

2• इसकी माला या ब्रेसलेट धारण करने से व्यक्ति का चित्त शांत रहता है, तनाव से मुक्ति मिलती है।
3• पीत गुंजा की माला गुरु गृह को अनुकूल करती है।
4• अनिद्रा से पीड़ित लोगों को इसकी माला धारण करने से लाभ मिलता है।
5• बड़ी उम्र के जो लोग स्वप्न में डरते हैं या जिन्हें अक्सर ये लगता है की कोई उनका गला दबा रहा है उन्हें इसकी माला या ब्रेसलेट पहनना चाहिए।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।
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क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा


गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है

इसको चिरमिटी, धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसे आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। इसका वजन एक रत्ती होता है, जो सोना तोलने के काम आती है। यह तीन रंगों में मिलती है। सफेद गुंजा का प्रयोग तंत्र तथा उपचार में होता है, न मिलने पर लाल गुंजा भी प्रयोग में ली जा सकती है। परंतु काली गुंजा दुर्लभ होती है।

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है -

वर-वधू के लिए : विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है। भगवान श्री कृष्ण भी गुंजामाला धारण करते थे। पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ करती है।


विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है। विष-निवारण : गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये।

यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें। इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

सम्मान प्रदायक :

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शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा। पुत्रदाता : पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ प्राप्त करती है। शत्रु में भय उत्पन्न : गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

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भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं। ज्ञान-


बुद्धि वर्धक :

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गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है। गुप्त धन दर्शन : अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

शत्रु दमन प्रयोग : काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा। कुष्ठ निवारण प्रयोग : गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

अंधापन समाप्त : गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं। देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.

४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
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रक्त गुंजा

रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो,शुक्र तथा मंगल गोचर में अनुकूल हों अथवा कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हस्त नक्षत्र हो, कृष्ण चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र हो या पूर्णिमा को शतभिषा नक्षत्र हो, तो आधी रात को निमंत्रण पूर्वक रक्त गुंजा की जड़ उखाड़ कर ले आएं। घर में लाकर उसकी मिट्टी हटा कर साफ कर दें फिर दूध से स्नान करवा कर धूप-दीप से पूजा करें। इस जड़ के घर में रहने से सर्प भय नहीं रहता…

गुंजा एक प्रकार का लाल रंग का बीज है जो देखने में बहुत सुंदर लगता है। इसके ऊपरी हिस्से पर छोटा सा काला बिंदु होता है। इसकी बेल जंगलों में वृक्षों पर लिपटी पाई जाती है। इसे रत्ती भी कहते हैं और किसी जमाने में इससे सोने की तौल की जाती थी। गुंजा का एक और प्रचलित नाम घुंघची है। यह दो प्रकार की होती है रक्तगुंजा और श्वेत गुंजा। इसके तांत्रिक प्रयोग निम्न हैं-

1-बकरी के दूध में गुंजा मूल को घिस कर हथेलियों पर रगड़ने से बुद्धि का विकास होता है। मेधा,चिंतन, धारणा, विवेक तथा स्मृति की प्रखरता के लिए यह प्रयोग उत्तम होता है।

2-रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो,शुक्र तथा मंगल गोचर में अनुकूल हों अथवा कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हस्त नक्षत्र हो , कृष्ण चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र हो या पूर्णिमा को शतभिषा नक्षत्र हो, तो आधी रात को निमंत्रण पूर्वक रक्त गुंजा की जड़ उखाड़ कर ले आएं। घर में लाकर उसकी मिट्टी हटा कर साफ कर दें फिर दूध से स्नान करवा कर धूप-दीप से पूजा करें। इस जड़ के घर में रहने से सर्प भय नहीं रहता।

3- इसकी जड़ को घिस कर माथे पर तिलक की तरह लगाने से मनुष्य में सम्मोहक शक्ति आ जाती है और हर व्यक्ति उसकी बात मानने को तैयार हो जाता है।

4-कहते हैं कि गुंजा की जड़ को बेल पत्र के साथ घिस कर काजल की तरह लगाने से पिछले जीवन की घटनाएं याद आ जाती हैं।

इसकी जड़ को गाय के दूध में पीस कर शरीर पर लेपन करने से कोई भी तांत्रिक साधना सफल होती है यहां तक कि कभी-कभी अशरीरी आत्माएं भी वश में हो जाती हैं जो हमेशा साधक की सहायता करती हैं और उसे छोड़ कर कहीं नहीं जातीं।

श्वेत गुंजा के तांत्रिक प्रयोग

जिस दिन कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी हो उस दिन निम्न मंत्र पढ़ते हुए जंगल से श्वेत गुंजा की फली और वहीं से मिट्टी खोद कर लावे और अपने बगीचे में बो दे ।

मंत्र-ऊँ श्वेतवर्णे सितपर्वतवसिनि अप्रतिहते मम कार्य कुरु ठःठःस्वाहा।

फली लाने और उसे बोते समय यही मंत्र पढें़। फिर प्रति दिन सायंकाल उसमें पानी डालते रहें और इस मंत्र का जप करते रहें।

ऊँ सितवर्णे श्वेतपर्वतवासिनि सर्व कार्याणि कुरु कुरु अप्रतिहते नमो नमः।

गुंजा के बीजों को किसी वृक्ष के समीप बोना चाहिए तकि वह लता उसका सहारा लेकर चढ़ सके। जब लता बड़ी हो जाए तो उसी वृक्ष के नीचे बैठ कर अंगन्यास करें और उसकी पंचोपचार पूजा कर निम्न मंत्र की 21 माला जाप करें।

ऊँ श्वेत वर्णे पद्म मुखे सर्व ज्ञानमये सर्व शक्तिमिति सितपर्वतवासिनि भगवति हृं मम कार्य कुरु कुरु ठःठःनमः स्वाहा।

किसी भी कामना की पूर्ति के लिए संकल्प ले कर मंत्र जप करने पर कामना पूर्ण होती है।

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वे विशेष उपाय हैं जिन्हें आप केवल दीवाली के दिन ही कर सकते हैं और पूरे वर्ष उनका असर बना रहता है। ये बहुत ही सस्ते और आसान हैं और असरदार इतने मानो चमत्कारी हों।
बुरी बलाओं से बचने के लिए
लगभग 100 ग्राम रत्ती या गुंजा या घुंघुची के दाने लें जो लाल रंग के हों। इन दानों को तांबे की कटोरी में रखें। फिर शनि के मंत्र की 11 मालाएं जपें। जप का समय है 23.29 से 1.51 तक। रात का जप ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। यह जप पूर्ण समर्पण के साथ हो। यह आप के पास एक ऐसी औषधि तैयार हो गई जो आपको इन बातों में मदद करेगी-
ल्ल गुप्त शत्रु की चालों को समाप्त कर देगी।
ल्ल बच्चों को नजर दोष होने पर इसे काले कपड़े में बांधकर उनके गले में पहनाएं।
ल्ल यदि घर में गरीबी अचानक आई हो या संतान गर्भ में ही प्राण त्याग देती हो, तो इसके कुछ दाने अपने घर के कोनों में बिखरा दें।
ल्ल यदि आपने कोई नया घर लिया है जहां आपका मन उखड़ने लगा है या आपका मन अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान से उखड़ रहा है, तो वहां इन दानों को पूजा स्थान में रखें।
अच्छी पढ़ाई व नौकरी में सफलता
दीवाली के दिन शाम 6.14 बजे से लेकर रात 8 बजे के बीच दूब घास, गुंजा तथा शमी अथवा पीपल की छोटी सी लकड़ी लेकर एक तांबे के बर्तन में रखें, फिर गणेश जी की पूजा करें। इसे सदैव पूजा में ही रहने दें। जो लोग पढ़ाई या नौकरी में बहुत संघर्ष कर रहे हैं उन्हें सफलता मिलेगी। इसे अपने बैग या पढ़ने की मेज या कार्य करने वाली मेज पर भी रख सकते हैं।
घबराहट व सिरदर्द की समस्या है तो
इस यंत्र को सादे कागज पर हल्दी का रंग बनाकर लिखें। लिखते समय 'ॐ' का जाप करते रहें। ऐसे कई सारे यंत्र बनाकर रख लें।
जब भी सिरदर्द, घबराहट या तनाव हो, तो इसे सिर पर बांधकर सो जाएं।
संपत्ति प्राप्ति के लिए
अनंतमूल की जड़ लें। उसे 'ॐ अं अंगारकाये नम:' की 11 मालाओं से सिद्ध करें। फिर उसे गले में पहनें। संपत्ति की समस्याएं समाप्त होंगी।
दुर्घटनाओं से बचने के लिए
अनंतमूल की जड़ तथा साबूत सुपारी लें। उसे महामृत्युंजय मंत्र की 11 मालाओं से सिद्ध करें। फिर उसे गले मे पहनें। यदि मारकेश भी लगा हो तो भी अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है, इसे घर में कोई भी व्यक्ति परेशानी या मारकेश के संकट के समय पहन सकता है। इसे उस व्यक्ति को भी जरूर पहनना चाहिए जिसके चोटें बहुत लगती हों।
धन प्राप्ति के लिए
ल्ल काली व सफेद गुंजा के दाने पूजा में रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें । इसे तीन बार लगातार करना होता है, इन दानों को हमेशा संभाल कर रखें।
ल्ल काली व सफेद गुंजा के दाने पूजा में रखकर 11 मालाएं ' ऊं श्रीं नम:' की जपें।
ल्ल एक और मंत्र देखें
ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं क्लीं ॐ वित्तेश्वराय नम:।
शिवजी के सम्मुख बैठकर इस मंत्र का जप सवा लाख बार करें और इस मंत्र को रात 11.39 से 12.30 के बीच में प्रारम्भ करके सवा लाख जाप पूरे होने तक करें, जिसमें कई दिन लगेंगे, पर गरीबी मिटाने में इस मंत्र का जवाब नहीं।
ल्ल बेलपत्र या अशोक या आक या बरगद के 11 पत्तों पर सिंदूर और हल्दी मिलाकर उस पर 'पं दं लं' लिखकर बहते जल में प्रवाहित करें। इसे शाम 6.56 से लेकर 8.13 बजे के बीच करें। ल्ल 

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गुंजा 'रत्ती' सात सौ रुपए किलो, ढूंढ़ रहे व्यापारीUpdated: Tue, 09 Dec 2014 03:01 AM (IST)


0 जिले में अपने आप उगने वाली उपेक्षित सबसे महंगा बीज

विश्वबंधु शर्मा/ सजन बंजारा-जशपुर/कोतबा (निप्र)। जिले में गुंजा जिसे रत्ती भी कहा जाता है, सबसे दुर्लभ वनस्पतियों के नाम के साथ ही सबसे महंगे बीज के रूप में सामने आया है। इस बीज को लेकर पहली बार चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस बीज को व्यापारी सात सौ रुपए किलो तक खरीदने को तैयार हैं और व्यापारी इस बीज को एडवांस में पैसे देकर भी खरीद रहे हैं।

गुंजा जिसे जिले में गूंज के नाम से लोग जानते हैं। नगरीय क्षेत्र के अधिकांश लोग गुंजा के बारे में जानकारी नहीं रखते, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गुंजा ग्रामीणों के आय का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहा है। जिले में गुंजा की बिक्री ऊंची कीमतों पर खरीदी जा रही है। गुंजा को मुख्य रूप से तीन प्रजातियों के लिए जाना जाता है, जिसका रंग सफेद, लाल-काला और भूरा रंग से है। सबसे ऊंची कीमत सफेद गुंजा की है, जिसके संकलनकर्ताओं को सात सौ रुपए किलो मिल रहे हैं। गुंजा की तीन प्रजातियां जिले में उपलब्ध हैं, जिसकी अलग-अलग कीमत है। सबसे अधिक कीमत सफेद गुंजा के बीज की है, जिसकी कीमत सात सौ रुपए है। प्रतिस्पर्धा में इसकी कीमत अधिक भी होती है। लाल रंग के गुंज की कीमत 70 रुपए किलो है। तीसरी प्रजाति कुछ काली और भूरे रंग लिए होती है उसकी कीमत तीन सौ रुपए किलो है। स्थानीय व्यापारी विजय ने बताया कि वे 10 साल से खरीदी कर बाहर के व्यापारियों को गुंजा बेच रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि इसका उपयोग क्या है। उन्होंने बताया कि एक बात विचारणीय है कि इसके संकलन और बिक्री करने वाले परंपरागत रूप से ही लगे हैं।

दिसंबर माह में सबसे अधिक व्यवसाय

नवंबर और दिसंबर माह में बीज निकलते हैं और यही समय होता है, जब संकलनकर्ता इस बीज से आय अर्जित करते हैं। बड़े व्यापारियों को जब बीज के कीमत की जानकारी मिल रही है तो कई व्यापारी इस व्यवसाय में खुद को जोड़ने में लगे हैं और स्थिति यह है कि कोतबा, फरसाबहार ब्लाक, पत्थलगांव ब्लाक में व्यापारी ग्रामीणों को एडवांस के रूप में भी पैसे दे रहे हैं, जिससे संग्रहण उनकों मिले। पंड्रीपानी क्षेत्र की स्थिति यह है कि कई किसान अब इसके बीज को लगाने भी लगे हैं। किसान अपने खेतों व आसपास की झाड़ियों के नीचे इसके बीज को लगा रहे हैं। सवाल यह है कि इस बीज का व्यवसाय गुपचुप तरीके से ही क्यों हो रहा है। इस बात को लेकर कई सवाल भी सामने आते हैं, लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि दवाओं के रूप में ही इसका उपयोग होता है, जिसके कारण यह कीमती है। अधिकांश व्यापारियों को इस बात की जानकारी भी नहीं है कि यह कहां जाता है और एक के बाद एक व्यापारियों को यह बीज बेचे जा रहे हैं।

क्या है गुंजा

गुंजा को जिले के पत्थलगांव, फरसाबहार विकासखंड सहित अन्य क्षेत्र में गूंज के नाम से जाना जाता है। मुख्य रूप से इसके क्षेत्रीय व्यापारियों के साथ पत्थलगांव, धरमजयगढ़ व रायगड़ जिले में अधिक व्यापारी हैं। लता जाति की यह वनस्पति है, जिसमें फलियां होती हैं और पकने के बाद फलियां स्वयं फट जाती हैं, जिससे गुंजा का बीज निकलता है और यह बीज काफी कीमती हो रहा है, जिसका कारण इसकी दुर्लभता है। अंग्रेजी नाम कोरल बीड है। हिंदी में इसे गुंजा, चौटली, घुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसके संस्कृत नाम भी कई हैं, जिससे इसकी पौराणिकता भी स्पष्ट होती है। कुछ राज्यों में राज्य की भाषाओं में अलग-अलग नामों से भी यह प्रचलित है। वहीं फारसी में गुंजा को चश्मेखरूस और अरबी में हबसुफेद कहा जाता है। जिले में यह सड़कों के किनारे, निर्गुंडी के पौधों सहित अन्य पौधों और झाड़ियों में लताओं में स्वयं बढ़ता है।

औषधि निर्माण में होता है उपयोग

वनस्पतियों एंव आयर्ुेवेद के जानकार भूपेंद्र थवाईत ने बताया कि आयुर्वेद में गुंजा का विशेष महत्व है और पेट से संबंधित रोगों के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। यह क्षेत्र में अत्यंत दुर्लभ वनस्पतियों में है और विशेष क्षेत्र में होने के कारण ही इसकी ऊंची कीमत है। उन्होंने बताया कि इसके जड़ और पत्तों का भी विशेष महत्व होता है और पत्ते और जड़ भी ऊंचे दामों मे बिकते हैं। पत्थलगांव के व्यापारी मो. हनीफ मेमन ने बताया कि छग में इसके उपयोग संबंधी जानकारी नहीं के बराबर है, लेकिन इसकी दिल्ली व महानगरों में अधिक मांग होती है। सबसे अधिक उपयोग गुंजा का हाजमे की दवा बनाने में किया जाता है और आयुर्वेद की दवा बनाने वाली कंपनियां इसे ऊंची कीमतों में खरीदते हैं।
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Thursday, March 13, 2025

12>होली में तुलशी जीकी प्रयोग सम्मान::-

  12>होली में तुलशी जीकी प्रयोग सम्मान::--


काल 14/03/2025 होलीकी दिन

इन चार निर्देश पालन कीजिये ।

  जोरुर  जोरुर जोरुर।


1>होलीकी दिन सबेरे पूजा कोरनेकेबाद

तुलशीजी की भी पूजा कीजिये धूप दीप देकर।

फिर तुलशी जिकी मंजर थोड़ासा तोड़कर लाल कपड़ा में बांध कर पर्समें रखिये सोर्बोदा।

इसीसे सारे आर्थिक स्थिति सुधार होंगे।


2>होलीकी दिन सबेरे तुलशीजीकी पूजा कीजिये ऐब शुभ शाम दोन टाइम शुद्ध घी की प्रदीप ज्बालाईये एबं इस मंत्र पाठ कीजिये

   

"ॐ महालक्ष्मयै नमः

ॐ महालक्ष्मयै नमः

ॐ महालक्ष्मयै नमः

ॐ महालक्ष्मयै नमः

ॐ महालक्ष्मयै नमः"

 


3>आज होलीकी दिन तुलशीजी को गुड़ एबं जल दीजिये।

इसीसे पारिबारिक कलह दूर होंगे।

एबं सम्पोर्क अच्छे होंगे।


4>आज होलीकी दिन तुलशीजीकी थोड़ासा जड़ लेकर लाल कपड़ा में बांध कर घरमे सालभर सुरक्षित रखनेसे आर्तिक समश्या दूर होंगे। 

   <-----आद्यनाथ राय चौधुरी---->

          13/03/2025 रात्रि 08:00 pm

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Friday, February 21, 2025

11>সনাতনধর্ম--ব্রহ্ম--জগৎ::--

 11>সনাতনধর্ম--ব্রহ্ম--জগৎ::--


ধর্ম অর্থ ধারণ করা।

ধর্ম সংস্কৃত 'ধৃ' ধাতু থেকে নিষ্পন্ন হয়েছে।

ধর্ম অর্থাৎ  যার দ্বারা নিজের এবং অপরের জীবন ও সমৃদ্ধি নির্ধারিত (বিধৃত) হয়, তা-ই ধর্ম।

অতএব ধর্ম হোল সর্বজনীন এবং সকলের কল্যানসাধন করে এমন।


মনু সংহিতা মতে ধর্মের 10 টি লক্ষণ

যেমন:--ধৃতি(ধারণ বা ধৈর্য), ক্ষমা,

দম(দমন), আস্তেয়( অচৌর্য), শৌচ(শুচিতা), ইন্দ্রিয়নিগ্রহ, ধী(বুদ্ধি), বিদ্যা,সত্য ও অক্রোধ---এই দশটি ধর্মের সাক্ষাৎ লক্ষণ। 

ধার্মিক লোক মাত্রেই এই দশটি আচরণই থাকতে হবে, তিনি যে কোন ধর্ম, ধর্মমতে বিশ্বাসী হোন- না-কেন।

হিন্দুধর্মের যথার্থ নাম সনাতন ধর্ম।

'সনাতন' অর্থ --যা অনাদিকাল থেকে চলে আসছে। 

সনাতন ধর্ম বলতে হিন্দুধর্মকে বোঝায়। সনাতন শব্দের অর্থ হলো শাশ্বত বা চিরন্তন। অর্থাৎ, যা আগে ছিল, এখনও আছে এবং ভবিষ্যতেও থাকবে, তাই সনাতন। 

সনাতন ধর্ম হলো সংস্কৃত এবং অন্যান্য ভারতীয় ভাষায় ব্যবহৃত হিন্দুধর্মের বিকল্প নাম। 

হিন্দুধর্মের অনেক অনুশীলনকারী হিন্দুধর্মের "প্রচলিত" রূপকে সনাতন ধর্ম বলে উল্লেখ করেন। 

সনাতন শব্দটি পবিত্র অথর্ববেদে, মনুসংহিতা সহ অন্যান্য অনেক স্মৃতিশাস্ত্রেও আছে। 

হিন্দুধর্ম হল ভারতীয় উপমহাদেশের একটি ধর্ম বা জীবনধারা, যার কোনো একক প্রতিষ্ঠাতা নেই। 

ব্রহ্মা, বিষ্ণু ও শিব হিন্দুধর্মের সর্বোচ্চ দেবতার এবং শ্রীকৃষ্ণকে স্বয়ং ভগবানের প্রতিনিধিত্ব করে। 


সনাতন ধর্ম = 'শাশ্বত ধর্ম, বা শাশ্বত আদেশ', 

 সংস্কৃত এবং অন্যান্য ভারতীয় ভাষায় ব্যবহৃত হিন্দুধর্মের বিকল্প নাম।। 


সনাতন হিন্দুধর্ম একটি প্রাচীন জীবনধারা।

যার অর্থ "চিরন্তন নীতি" বা "চিরন্তন পথ"। হিন্দুরা মনে করে যে হিন্দুধর্ম হাজার হাজার বছরের পুরোনো।

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ব্রহ্মের স্বরূপ হলো::--

   "সত্যং জ্ঞানম্  অনন্তম্।"

আত্মার স্বরূপ হলো::--

    " নিত্য--শুদ্ধ--বুদ্ধ--মুক্ত।"


ব্রহ্ম ও আত্মা ---দুই-ই এক।

জ্ঞানীরা যাঁকে ব্রহ্ম বলেন, যোগীরা তাঁকেই আত্মা বলেন।

যিনি  জ্ঞান-স্বরূপ, বোধ-স্বরূপ অর্থাৎ ব্রহ্ম, তাঁকে জানলেই পূর্ণজ্ঞান হয়।

পূর্ণজ্ঞান লাভ করাই অর্থাৎ ব্রহ্মজ্ঞান লাভ করাই যদি উদ্দেশ্য হয়, তবে সেটি লাভ হলেই জ্ঞানের পরাকাষ্ঠা-- অর্থাৎ জ্ঞানচর্চার অন্ত হয়।

তাই বেদান্ত হলো জ্ঞানান্বেষনের শেষ ধাপ। কিন্তু মনে রাখতে হবে ব্রহ্ম অনন্ত বটেন। তাই তাঁকে জানা শেষ হতে পারে না।

আসলে, তাঁকে জানা, সীমার মধ্যে বস্তুকে যেভাবে জানা হয়, সেভাবে জানা নয়।

প্রকৃতপক্ষে ব্রহ্মকে জানার অর্থ ব্রহ্মে লীন হওয়া অর্থাৎ ব্রহ্মই হওয়া।

শ্রী শ্রী ঠাকুর রামকৃষ্ণ দেব যেমন উপমা দিয়েছেন-- নুনের পুতুল সমুদ্র মাপতে গিয়ে সমুদ্রের নোনাজলে গলে মিশে সমুদ্রের সঙ্গে একাকার হয়ে গেল।


চারটি বেদে ব্রহ্মের স্বরূপ চারভাবে সন্ধান করা হয়েছে।

অন্বেষণের এই মূল সূত্রগুলিকে 'মহাকাব্য'

ধরতে হবে।

যেমন:::---

 "প্রজ্ঞানং ব্রহ্ম" (ঋগ্বেদ )

 "অহং ব্রহ্মাস্মি"( যজুর্বেদ)

 "তত্ত্বমসি"(সামবেদ)

  "আয়মাত্মা ব্রহ্ম"( অথর্ব বেদ)


ব্রহ্মের স্বরূপ অন্যভাবে বলা হয়---

সচ্চিদানন্দ--সৎ, চিৎ ও আনন্দ।


সৎ অর্থাৎ যা আছে, নিত্য অর্থাৎ তিনকালেই আছে--অতীতে ছিল, বর্তমানে

আছে এবং ভবিষ্যতেও থাকবে। এক কথায় অনাদি, অনন্ত। ব্রহ্মই একমাত্র নিত্য বস্তু।

চিৎ অর্থ:-- চৈতন্য, যা উদ্ভিদ, কীট-পতঙ্গ,

ইতর প্রাণী, এবং মানুষের মধ্যে প্রাণরূপে প্রকাশিত। বিশ্বচরাচরের সর্বপ্রাণীতে, সর্ববস্তুতে তিনিই বিভূ, চৈতন্যরূপে অনুস্যুৎ হয়ে আছেন।


আনন্দ;--একটি বিশিষ্ট সম্পদ বা অনুভূতি , যা সমস্ত সৃষ্টির মূল। 

তিনি রসস্বরূপ, আনন্দস্বরুপ।

বেদ বলছেন-- তিনি নিরাকার, নির্গুণ এবং নিষ্ক্রিয়।

শাস্ত্র বলছেন::-- নিষ্ক্রিয় ব্রহ্মের ইচ্ছাই প্রথম স্পন্দন।

এই স্পন্দনই -- ওঁ--কার।

সৃষ্টির মূলে এই ওঁ--কার বা অনাহত নাদ।

নাদ --অর্থ শব্দ।

বস্তুজগতে শব্দের সৃষ্টি হয় বাতাসের সঙ্গে কোন বস্তুর সঙ্ঘাতের ফলে ।

ওঁ--কার সেইরকম কোন শব্দ নয়। কারণ 

ওঁ-কার সৃষ্টির আগে তো বায়ুর অস্তিত্বই নেই।

মূল ওঁ-কারই বিকারপ্রাপ্ত হতে হতে দৃশ্যমান বিশ্ব- চরাচরের সমস্ত কিছুর মূল উপাদান সূক্ষ্ম পঞ্চভূতে ( ব্যোম্, মরুৎ, তেজ, অপ ও ক্ষিতি) সূক্ষ্মরূপে পরিণত হলো। তারপরে এই সূক্ষ্ম পঞ্চভূতের  বিশেষ সংমিশ্রণ প্রক্রিয়া,  জাকে 

" পঞ্চিকরণ" বলে, তার দ্বারা স্থূল পঞ্চভূতের (আকাশ, বায়ু, অগ্নি জল ক মাটি)সৃষ্টি হলো। এর পরে মানুষের পাঁচটি জ্ঞানেন্দ্রিয়র (চক্ষু,কর্ণ, নাসিকা, জিহবা এবং ত্বক) দ্বারা আস্বাদযোগ্য যাকিছু তার সৃষ্টি হলো। একেই আমরা 'জগৎ' বলি।

             (সঙ্কলিত)

   <------আদ্যনাথ রায় চৌধুরী----->

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Monday, January 27, 2025

10>aith 46>||তন্ত্র আর কিছু কথা ||(1+2)

  10>aith 46>||তন্ত্র আর কিছু কথা  ||(1+2)

           Part (1)

            <-----আদ্যনাথ----->

 সেদিন দেখলাম এক সাধু সাধনায় বিভোর। 

মধ্যপ্রদেশের  এমন শুষ্ক জঙ্গলে 

যেখানে শুধুই পলাশ ও মহুয়ার জঙ্গল ,

কাছে ধারে অন্তত 5/7 মাইলের মধ্যে কোন জনবসতি নাই। জঙ্গলে তেমন কোন ফলের গাছও নাই কেবল দুই একটি আমলকি গাছ দেখাযায় তাও সংখ্যায় অতি কম।

এমন জায়গাতে ধ্যানমগ্ন সাধুকে দেখে বেশ অবাক হলাম। 

আমি জিপ নিয়ে যাচ্ছিলাম চম্পা থেকে বিলাসপুরের দিকে ।

ইচ্ছা হোল ওই জঙ্গলের ভিতরের মন্দিরটা একটু দেখে যাই, বহুদিন আগে একবার এসেছিলাম তাই ইচ্ছা হোল,  জিপ ঘুরিয়ে দিলাম জঙ্গলের দিকে  হঠাৎ দেখি ওই মন্দিরের একটু আগেই পাকদন্ডির ধারে জঙ্গলের মধ্যে একটি ঢিবির উপরে বসে আছেন এক সাধু। ইচ্ছা হোল একটু কথা বলি কিন্তু প্রায় আধা ঘন্টা দাঁড়িয়েও সাধুর ধ্যান ভাঙলো না। অগত্যা আজকের মতন মনের ইচ্ছা মনে চেপে রেখে রওনা দিলাম। আরএকটু এগিয়ে গিয়েই সেই মন্দিরটি  দেখলাম।

এমন সুন্দর কারুকার্য করা মন্দির  ভিতরে কোন দেবতা আছে জানিনা কারন আজও দেখলাম মন্দিরের গেট বন্ধ।

তবে বাইরে থেকে দেখে মনে হয় কোন শিব মন্দিরই হবে।

তবে মন্দিরটির সম্পুর্ন দেওয়ালে সেই পুরীর মন্দিরের মতন স্ত্রী-পুরুষের যৌনমিলনের মূর্তি । 

গ্রামটির নাম ভুলে গেছি তবে মবেহয় ছিন্নর।

একটু দাঁড়ালাম যদি কোন মানুষের দেখা পাই তো মন্দিরটির বিষয়ে যদি কিছু জানতে পারি।

এই জঙ্গলের আমাদের ক্যাম্প আছে দুইটি  সেও অনেক দূরে দূরে।

আমি ড্রিলিং এর কোর সেম্পেল নিয়ে যাচ্ছিলাম বিলাসপুরের  অফিসে ।



(আমি যে ছিন্নর গ্রামের কথা বলছি  সেটি

কিন্তু মধ্যপ্রদেশের বালাঘাট জেলার চিন্নর  জেলা জিআই ট্যাগ পাওয়া চিন্নর নয়।

চিন্নর বিখ্যাত এক প্রকার চালের জন্য।

 এটি একটি স্বাদু, মিষ্টি, এবং সামান্য আঠালো চাল। রান্নার পরেও এটি জল ধরে রাখে। চিন্নর চাল থেকে তৈরি খির বালাঘাটের মানুষের মধ্যে খুব জনপ্রিয়। )


কিন্তু সেই সাধুর তাঁর ধ্যান থেকে জাগলেন না। 

আমার কোরস্যাম্পেল গুলি অফিসে পৌঁছতে হবে তাই একটু তারা আছে।

সেই কারণে আর অপেক্ষা না করে চলেগেলাম।

কিন্তু মনে একটু খটকা লাগলো ঐসাধুর জন্য । তাই ফেরার পথে তখন সন্ধ্যে 6টা হবে জঙ্গলে অন্ধকার নেমে আসছে, আমি আবার গেলাম ওই সাধুকে দেখতে। গিয়ে দেখি সাধু কিছু কাঠ কুড়োচ্ছেন। আমি আযাচক হয়ে ওনাকে কাঠ কুড়োতে একটু সাহায্য করলাম। সাধু আমাকে আশীর্বাদ করলেন। আমি কিছু কথা জিজ্ঞাসা করতেই উনি মুখে আঙ্গুল দিয়ে চুপ করতে বললেন। আমি অবাক হয়ে চুপ থাকলাম।

তারপরে সাধুটি ইশারায় আমাকে ওনার সাথে যেতে বললেন। আমি ওনার কথামতন ওনার পিছু পিছু এগিয়ে চললাম।

জঙ্গলের ভিতর গিয়ে দেখি ছোট্ট একটি কুঠি , সাধু কুঠিরের মধ্যে ঢুকে গিয়ে একটি কাঠি দিয়ে মেখেতে হিন্দিতে লিখলেন।

"अभी तुम निकल जाओ। 

बादमे भेट करना अमरकंटक में।"

এমন কথা লিখেই উনি আমাকে যেন তাড়িয়ে দিতে পারলেই বাঁচে, এমন ভাব করে প্রায় দূর দূর করে আমাকে তাড়িয়েই দিয়ে ছিলো সেদিন।

এর কিছু দিন পরে আমি গিয়েছিলাম এমরকন্টকে সেই সাধুর খোঁজ করতে।

এর আগেও আমি অমর কন্টকে এসেছিলাম তাই কিছু মানুষ ও সাধুর সাথে পরিচয় আছে।

আমি সকলকেই ওই সাধুর ব্যাপারে জিজ্ঞাসা করে কোন খবর পেলাম না।

সেবার আমি ছয় দিন ছিলাম অমর কন্টকে, তৃতীয় দিনে গেলাম

নর্মদা মন্দির থেকে 4-5 কিলোমিটার দূরে শোনমূঢ়াতে।

এখানে শোন ও ভদ্র  নদীর উত্‍পত্তিস্থলে গড়ে উঠেছে দেবী শোনাক্ষীর মন্দির, যা একান্ন সতীপীঠের অন্যতম পীঠ। 

ব্রহ্মার মানস পুত্র শোন।ব্রহ্মার চোখের জল থেকেই শোন নদীর উৎপত্তি।

শোনের উদ্‌গম স্থলের অনতিদূরে ভদ্র নদীর উৎস স্থান। এখান থেকেই শোন ও ভদ্র এক হয়ে জল প্রপাতের সৃষ্টি করেছে। সেই প্রপাত দেখবার মতো। এরপর দীর্ঘ পথ অতিক্রম করে শোন বিহার প্রদেশে শোনপুরে গিয়ে গঙ্গায় মিলিত হয়েছে।

এখানে শোন ভদ্র কুণ্ডের  কাছে যেতেই দেখা হোল সেই সাধুর সঙ্গে।

আমাকে দেখেই সাধু একটু হেসে বললো 'কি মনে পড়েছে?"

আমি ওনার মুখে বাংলা কথা শুনে খানিকটা অবাক হয়ে তাকিয়ে ছিলাম। উনি নিজেই বললেন কি হোল! আরে আমি বাংলা জানি। 

আয় আমার কুঠিতে আয়, এইবলে উনি আমাকে যে কুঠিতে নিয়ে গেলেন সেই কুঠি আমার চেনা।

আমি বললাম বাবা এখানে তো একদন্ডী বাবা থাকতেন! 

সাধু বললেন হ্যাঁ গুরুজী নাসিক গেছেন কুম্ভ স্নানে এখনো ফেরেরনি , উনি ফিরলেই আমি যাবো হরিদ্বার।

এই স্থানেই আমার সাধনার স্থান।

এখানেই আমি শবসাধনা কিরেছি গুরুজীর উপস্থিতিতে।

আমি জিজ্ঞাসা করলাম যে শবসাধনা সেতো তাড়াপীঠে হয় দেখেছি।

মরা লাশের পিঠে ত্রিশূল পুঁতে যজ্ঞ কুন্ড জ্বালিয়ে। রাত ভর সেকি কান্ড।

সেবার এমন সাধনা দেখে ভিষিন অবাক হয়েছিলাম। তা এই এমরকন্টকেও শবসাধনা হয় জানতাম না।

সাধু বললেন হ্যাঁ শবসাধনা ভীষণ কঠিন সাধনা। অমরকন্টের এই শোনমূঢ়ার

দেবী শোনাক্ষীর মন্দির, যা এক সতিপিঠ।

আর সতিপিঠ মানেই সিদ্ধ স্থান।

এখানে সকল সাধনার উৎকৃষ্ট স্থান।

আমি বেশ উৎসাহ অনুভব করলাম এবং শবসাধনার বিষয়ে জানবার ইচ্ছা প্রকাশ করলাম সাধু মহারাজের কাছে (ওনার নাম সিদ্ধান্তনন্দ)। এর পরে আরও তিন দিন ওই শোনমূঢ়ায় থেকে সাধুজীর কাছে 

তন্ত্র সাধনার অনেক কথাই জেনেছিলাম।

আজ সেই সাধু কাছে শোনা তন্ত্র সাধনা নিয়েই লিখছি--------(যেটুকু যা বুঝতে পেরেছিলাম ও যা কিছু মনে আছে )

শুরু কিরেছি  "শব সাধনা" নিয়ে কিছু লিখতে------


  "সাহসে যে দুঃখদৈন্য চায়

   মৃত্যুরে যে বাঁধে বাহুপাশে।

    কালনৃত্য করে উপভোগ

    মাতৃরূপা তারি কাছে আসে ।"

                  ( বিবেকানন্দ)

এমন কথাই তন্ত্রের মূল কথা ।

সাধুজীর কথায় কালী,করালিনীর উপাসনা , ভীমার পূজা, রুদ্রানীর আবাহন

প্রভৃতি----দুর্বল হৃদয়ে কাজ নয়।

সাহসী শক্তিমানের একান্ত আত্মবিশ্বাসের 

উপর নির্ভর করে অসীম সাহসেরসঙ্গে এই সাধনা করতে হয়।

আসলে অমোঘবীর্যে প্রতিষ্ঠা যে সাধনা সেখানে হৃদয়ের সকল বাসনা, কামনাকে নির্মূল করে সাধকের হৃদয়কে শ্মশান করে তোলে এবং সেই উন্মুক্ত হৃদয়ে মহা আনন্দে সর্বসুন্দরের অধিকারী  শ্যামাসুন্দরীর নৃত্য হবে। আর এভাবেই তন্ত্র সাধনা হয়।


তন্ত্র সম্বন্ধে বলা হয়---

" তন্ত্র" শব্দটি ( 'তন্' ধাতু নিষ্পন্ন যার অর্থ 'বিস্তার')

তন্ ধাতুর উত্তর উনাদি প্রত্যয় ষ্ট্রন্ প্রয়োগ করে ব্যুৎপন্ন হয়েছে। তন্' ধাতুর অর্থ 'বিস্তার'। 

বিশেষ বিশেষ পন্ডির যাঁরা তন্ত্র সাধনা বিষয়ে  জ্ঞান রাখেন যেমন বাচস্পতি, আনন্দগিরি এনদের  মতে তন্ত্রি ধাতু থেকে তন্ত্র শব্দ ব্যুৎপন্ন। তন্ত্রি ধাতুর অর্থ ব্যুৎপাদন বা জ্ঞান। 

এভাবেই দেখা যায় যে তন্ত্রি ধাতুরও অর্থ বিস্তার রূপে ব্যাখ্যা করা যেতে পারে। 

সুতরাং তন্ত্র শব্দের দ্বারা যে কোন বিস্তারিত আলোচনা বুঝানো যায়।



সেইজন্য দেখা যায় প্ৰাচীন কালে যাগ, যজ্ঞ, ক্রিয়া, তত্ত্ব, বিজ্ঞান প্রভৃতি বিষয় বুঝানোর জন্য তন্ত্র শব্দের প্রয়োগ হয়েছে।

এভাবেই সংখ্যা দর্শনের গ্রন্থাদির নাম ছিল 

ষষ্টিতন্ত্রশাস্ত্র, ন্যায়তন্ত্র,ধর্মতন্ত্র,ব্রহ্মতন্ত্র,

যোগতন্ত্র,আয়ুর্বেদতন্ত্র প্রভৃতির উল্লেখ পাওয়া যায়।

কিন্তু কালক্রমে তন্ত্র শব্দের সঙ্কীর্ণতর ক্ষেত্রে প্রয়োগ দেখা যায়।

সংক্ষেপে বলতে গেলে তন্ত্রের(4 )চারটি অংশ::---

●1>জ্ঞান--- অর্থাৎ দার্শনিক মতবাদ, 

বীজাদির শক্তি সম্বন্ধে জ্ঞান, মন্ত্রশাস্ত্র।

●2> যোগ----অর্থাৎ ধ্যানধারণাদির বর্ণন ও বিবিধ সিদ্ধিলাভের জন্য মায়াযোগ।

●3>ক্রিয়া---মূর্তি--মন্দিরাদির 

নির্মাণবিষয়ক  আলোচনা এবং

●4>চর্যা---- অর্থাৎ আচার-- ব্যবহার, উৎসব ব্রত  প্রভৃতির  আলোচনা।


এ-হেন আলোচনা থেকে অতি সহজেই বোঝাযায় যে তন্ত্রশাস্ত্র এক বিশাল সমন্বয় - প্রচেষ্টা। 

"বহু ভাবধারার প্রবাহ ভারতের জীবনে বিভিন্ন অববাহিকাকে অবলম্বন করে এসেছিল। তারই সমীকরণের ফল তন্ত্রশাস্ত্র।"

এমনটাও জানা যায় যে -----

"বেদের কর্মকান্ড ,মীমাংসা,বেদান্ত, সংখ্যা,

যোগ , বৈষ্ণব মতবাদ, চরক ও সুশ্রুতের চিকিৎসাশাস্ত্র প্রভৃতি সকল কিছুই তন্ত্রের মতবাদের অঙ্গরূপে তন্ত্রের মধ্যে বর্তমান।"


এছাড়াও তন্ত্র শাস্ত্রের বিশেষ অংশ যা 

বামাচার নামে প্রখ্যাত তা আর্য ও অনার্য ভাবধারার সংমিশ্রণ।


[[[  তন্ত্র শাস্ত্রের ইতিহাস খুঁজতে গেলে 

পাওয়ায় যে----

 বিবেকানন্দ সহ বহু মনীষীদের মতে 

বৌদ্ধরাই তন্ত্রের শ্রষ্টা।

এক সময়ে ভগবান তথাগতর ইচ্ছার বিরুদ্ধে সঙ্ঘে নারীজাতির স্থান দিয়েছিলেন। কিন্তু সঙ্গে সঙ্গে কঠিন বিধিনিষেধের দ্বারা সঙ্ঘে স্ত্রী-পুরুষের মেলামেশাকে নিয়ন্ত্রিতও করেছিলেন।

তথাপি সময়ে নানা জাতিসমূহের অনৈতিক প্রথার সংমিশ্রনে নানা মতের উদ্ভব ও স্ত্রী --পুরুষের সাহচর্যে  নিশাকালে নানারূপ গুহ্যসাধনার ব্যবস্থা করা হয়।

এভাবেই বৌদ্ধগ্রন্থ গুহ্যসমাজতন্ত্রে বামাচার তন্ত্রের সৃষ্টি হয়।

প্রজ্ঞাভিষেকে এর উল্লেখ আছে।

প্রজ্ঞাভিষেকের মূলকথা শক্তিগ্রহণ।

গুরু, শিষ্যের অভিলষীতা,সুন্দরী ,

যোগপারদর্শিনী শক্তির সঙ্গে শিষ্যকে মিলিত করবেন। এই বিদ্যাগ্রহণ বা 

শক্তিগ্রহণ ব্যতিরেকে বুদ্ধত্ব প্রাপ্তির অন্য উপায় নাই। এই শক্তি আপরিত্যাজ্যা।

এই শক্তিগ্রহণের নাম বিদ্যাব্রত।

এরপরে যখন বৌদ্ধ ধর্ম ধীরে ধীরে হিন্দুধবর্মের সঙ্গে মিলিত হয় তখন সকল বৌদ্ধ তান্ত্রিক আচার সনুষ্ঠান হিন্দুধর্মে অনুপ্ৰবিষ্ট হয়ে হিন্দুতন্ত্রের  সৃষ্টি হয়।

হিন্দুতন্ত্র  যে বৌদ্ধোত্তর এবং বৌদ্ধতন্ত্র থেকে উদ্ভূত তা বহু মনীষী স্বীকার করেছেন।

স্বামী বিবেকানন্দ বলেছেন 

" আমার বিশ্বাস আমাদের মধ্যে প্রচলিত তন্ত্রের সৃষ্টি বৌদ্ধরাই করেছে।"

আসলে তন্ত্র হোল সমন্বয়-শাস্ত্র এবং এর যা পরমতত্ত্ব তা অদ্বৈত বেদান্তের তত্ত্ব থেকেই গ্রহীত।

তন্ত্রমতে নির্গুণ ব্রহ্মই মায়াসংযুক্ত হয়ে জগতের সৃষ্টি করেন। কিন্তু বেদান্তের মায়া 

"সদসদভ্যামনির্বচনীয়া"।

আর তন্ত্রের মায়া ব্রহ্মের সহিত অভিন্ন এবং সদ্রূপা। সুতরাং বেদান্তের জগৎ যে-অর্থে মিথ্যা তন্ত্রের জগৎ সেই অর্থে মিথ্যা নয়। ]]]

   <-------আদ্যনাথ রায় চৌধুরী-------->

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  তন্ত্র আর কিছু কথা  ||(2)

           Part (2)

            <-----আদ্যনাথ----->

★আসল কথা হোল শিবতত্ত্ব ও শক্তিতত্ত্বের অবলম্বন করে শাক্ত মতবাদ এবং শক্তির পূজা প্রতিষ্ঠিত।

বলাহয় সাধকের হিতের জন্যই ব্রহ্মের রূপ কল্পনা করা হয়। 

বাংলার তন্ত্রসাধক  কালীর সাধক ।

কালীর উপাসনা  বাঙালির একান্ত নিজের প্রাণের উপাসনা। তাইতো কালী মুর্তিকল্পনায় স্বয়ং শিব- শবরূপে কল্পনা----এ-হেন শিবতত্ত্ব--শিব যিনি অহম্ বোধে মগ্ন। আর মহাকালী--

--তিনি--শক্তিতত্ত্ব-- তিনি সর্বদা ক্রিয়াশীল

-- ক্রিয়াশক্তি--সৃষ্ট্যুন্মুখী--অর্থাৎ সৃষ্টির তরে উন্মুখ। তাঁর অন্তরে সৃষ্টির বীজ রয়েছে। অন্যান্য দেবীমূর্তির কল্পনাতেও এই শিব--শক্তিতত্বেরই প্রকাশ।

এই শক্তি তত্ত্ব এর মূলেও রয়েছে বেদ।

কারণ ঋগ্বেদের  দশম- মন্ডলে দেবী সূক্তে বলা আছে ---"আমার দ্বারাই লোক জীবিত আছে। অন্নগ্রহণ ও শ্রবণাদিও করছে।

আমাকে যে অবহেলা করে সে বিনষ্ট হয়। 

তুমি শ্রদ্ধাবান । এইজন্য তোমাকে বলছি।

দেবী ভগবতী মহামায়ার পূজা বাহ্যিক ও হতেপারে বা অন্তর ধ্যানজপাদিও হতে পারে।  

দেবীর গূঢ় রহস্য ব্যাখ্যা করা সে এক বিশাল কঠিন ব্যাপার ।দেবীর মন্ত্রাদির যে তত্ত্ব তাও ব্যাখ্যা করা অতি দুরূঢ় ব্যাপার, যা এই ছোট অবসরে সম্ভব নয়।

          

তবে এইটুকু আমাদের অবশ্যই জেনে রাখতে হবে যে দেবীর বাহ্যিকপূজার

আরালে  এবং বিভিন্ন মন্ত্রাদির ব্যবহারে সচেতন বিন্দু ,নাদ,ও বীজামন্ত্র অবলম্বন করে একটি বিরাট দার্শনিক পটভূমিকা আছে।

●মন্ত্র তন্ত্রের মন্ত্র সকল  নিরর্থক শব্দমাত্রই নয়।

তন্ত্র বলে যে, মানব দেহভান্ড ব্রহ্মাণ্ডেরই প্রতিরূপ। এই দেহে শিব-শক্তি আছেন।

পরম শিব সহস্রারে এবং শক্তি কুন্ডলিনীরূপে  মূলাধারে। অবরোহক্রমে।

এই জগতের সৃষ্টি।

অবরোহক্রমে সাধক কুন্ডলিনীর সঙ্গে পরম শিবের মিলন করতে পারলেই মোক্ষ লাভ হয়। এই মিলনসাধনের জন্য তন্ত্রে পূজা, ধ্যান, মন্ত্রজপ,হোম, দীক্ষা প্রভৃতি নির্দিষ্ট হয়েছে।

এই বিষয়ে আর একটি বিষয়ের হল;--

তন্ত্র আর্য ও আর্যেতর ভাবধারার সংমিশ্রণ।

এর ফলে তন্ত্রের মধ্যে বৈদিক ও অবৈদিক আচার মিশ্রিতভাবে আছে। তন্ত্রে সাধকের জন্য যেসকল আচার  নির্দিষ্ট আছে তা বিশেষ তন্ত্রের মতে সাতটি---

1>● বেদচার, 

2>●বৈষ্ণবাচার,

3>●শৈবাচার,

4>●দক্ষিণাচার,

5>●বামাচার,

6>●সিদ্ধান্তাচার,

7>●কৌলাচার।

এগুলির মধ্যে প্রথম চারটি অর্থাৎ

বেদচার, বৈষ্ণবাচার,শৈবাচার,দক্ষিণাচার,

এরা বেদপর এবং শেষ তিনটি--

বামাচার,সিদ্ধান্তাচার,কৌলাচার, এগুলির

আচার অবৈদিক ভাবপূর্ন।

সাধারনত প্রথম চারটি আচার হিন্দুধর্মের -- মর্মে মর্মে অনুপ্ৰবিষ্ট হয়ে বাঙালীর ধর্মসাধনাকে প্রাণবন্ত করেছে। তত্ত্বের সঙ্গে ক্রিয়ার সহযোগে একটি সাধনার সহজ পথের আবিষ্কার করেছে।

বাঙালী জাতির পূজা দীক্ষা, ব্রত, নিয়ম প্রভৃতি সকল বিষয়ই তন্ত্রের এইসকল আচার দ্বারা পরিচালিত।

কিন্তু বামাচার প্রভৃতি ---যা গোপনে অনুশিষ্ঠ প্ৰক্রিয়াদির সহযোগে অনুষ্ঠিত

হয়--তা অনৈতিক ভিত্তিভূমির উপরে আস্তৃত (বিস্তৃত বা প্রসারিত)। এইসকল আচারে পঞ্চমকারের অনুষ্ঠানে মদ্য,মাংস,মৎস্য, মুদ্রা, এবং স্বকীয়া বা পরকীয়া স্ত্রীগ্রহণ করা হয়।

অবশ্য তন্ত্রে অধিকারভেদে  তিনটি ভাবকে আশ্রয় করার কথা আছে।

★দিব্যভাব, ★<বীরভাব, ★পশুভাব।

দিব্যভাবের যাঁরা মানুষ তাঁরা উচ্চস্তরের লোক। 

তাঁদের পক্ষে মদ্য অর্থে সহস্রার ক্ষরিত সুধাধারা, 

কাম ক্রোধ প্রভৃতি রিপুকে ছেদনপূর্বক নির্বিষয়তালাভই মাংসগ্রহণ, 

অহঙ্কার দম্ভ প্রভৃতিকে বশীভূত করাই মৎসভক্ষণ, 

আশা তৃষ্ণা প্রভৃতি অষ্টমুদ্রাকে দমন করাই মুদ্রা গ্রহণ এবং 

ইড়াপিঙ্গলা- বাহিত বায়ুর সুষুম্নাতে সংযোগই স্ত্রীগ্রহণ ।


যাঁরা পশু ভাবে-- স্থিত তাঁদের পক্ষে সম্বিদা, গুঁড়ার্দ্রক প্রভৃতি মদ্যের অনুকল্প, 

লবনার্দ্রক  মাংসানুকল্প, 

লবণতৈলাক্ত দগ্ধকুষ্মান্ড মৎসানুকল্প, ঘৃতে ভর্জিত মুগ প্রভৃতি বীজ মুদ্রাকল্প এবং রক্তচন্দনানুলিপ্ত অপরাজিতা এবং করবী পুষ্পের সংযোগেই পঞ্চম মকারানুকল্প।


বীরভাবে কিন্তু মুখ্য পঞ্চতত্ত্বের ব্যবহার আবশ্যিক এবং বামাচারীদের মতে কলিযুগে পশুভাব প্রতিষিদ্ধ । 

কাজেই যেহেতু দিব্যভাবের সাধক দুষ্প্রাপ্য সেই জন্য অধিকাংশ তান্ত্রীকেরই বীরভাবে মুখ্য পঞ্চতত্ত্ব গ্রহণ করেই সাধন করা উচিত---বামাচারীদের মতে। 


এই কারনেই বামাচার বাংলার সমাজে গভীরভাবে আত্মপ্রবেশ করেছে। 


বীরভাবের বামাচার  সাধবের অবশ্য একটি মনস্তাত্ত্বিক ভিত্তিভূমি আছে। যেসকল লোক সহজাত প্ৰবৃত্তির অবদমনহেতু মানষিক - আপচারসম্পন্ন

(Psycho-pathological) তাদের মানবগ্রন্থির মোচনের জন্য বা সংস্কারের উদ্গতির জন্য বীরভাবের সাধনা ফলদায়ক হতে পারে। 


ভোগের পথে মানুষের মনকে ধীরে ধীরে কিভাবে ঈশ্বরাভিমুখী করা যায় সেই অসাধ্য সাধনেই বীরভাবের প্রচেষ্টা। রূপরস মুগ্ধ অস্বাভাবিক মনোবিশিষ্ঠ  মানুষকে সাহায্য করাই বীরভাবের উদ্দেশ্য। 


সুস্থিমনঃসম্পন্ন  স্বাভাবিকবৃত্তিবিশিষ্ট  মানবের জন্য কিন্তু এপথ নয়। এপথে  

শ্রীশ্রী রামকৃষ্ণদেবের কথায় --"পায়খানার পথ"। স্বামী বিবেকানন্দ বলেছেন ::--

"যে জঘন্য বামাচার তোমাদের দেশকে নষ্ট করে ফেলেছে অবিলম্বে তা ত্যাগ কর । তোমরা ভারতবর্ষের অন্যান্য স্থান দেখেনি। দেশের পূর্বসঞ্চিত জ্ঞানের যতই বড়াই কর না কেন, যখন আমি দেখি আমাদের সমাজে বামাচার কী ভয়ানকরূপে প্রবেশ করছে, তখন উহা আমার অতি  ঘৃণিত নরকতুল্য স্থান বলে বোধ হয়।

এই বামাচার সম্প্রদায় আমাদের বাংলাদেশের সমাজকে ছেয়ে ফেলেছে আর রাত্রে বীভৎস ব্যাভিচারে লিপ্ত থাকে তারাই দিনেরবেলা উচ্চকন্ঠে আচারের কথা বলে ।"


সুতরাং এই বামাচার প্রভৃতি কুৎসিত ব্যাপার সযত্নে পরিহার করে তন্ত্রের মধ্যে যাকিছু ভালো জিনিষ আছে তা গ্রহণ করতে হবে। তন্ত্রের সবচেয়ে বড় কথা  মাতৃভাবে দেবীর উপাসনা এবং এই উপাসনা করতে হবে নির্ভয় হয়ে। অভয়প্রতিষ্ঠ সাধকই যথার্থ বীরসাধক।

মদ্য মাংসাদিসেবী তথাকথিত 

বীরভাবালম্বী বীরসাধক নয়। এই বীরসাধক ছিলেন বীরেশ্বর বিবেকানন্দ যিনি ভীষণকে ভিষনতার জন্যই পূজা করতে চেয়েছিলেন, যিনি উপদেশ করেছিলেন তাঁর শিষ্যকে যে, যখন মায়ের কাছে প্রার্থনা জবাবে তখন "মনে রেখো তিনি যেন তোমার প্রার্থনা শুনতে বাধ্য হন। মায়ের কাছে  কোন আর্তভাব যেন প্রকাশ না পায়। স্মরণ রেখো।" 


সত্য এই তো যথার্থ বীরভাবের কথা।

আমরা নানান স্থানে নানা ভাবে মায়ের পূজা করি। কিন্তু প্রকৃত ফল কিছু পাই কি?  

অঙ্গহীন হলে বা শ্রদ্ধার  অভাব হলে পূজার ফলাফল হয় না, বিপরীত ফলও ঘটতে পারে। কজেই ঠিক ভাবে পূজা 

করাই উচিত আর এই সঠিক ভাবে  পূজা

করতে হলে অভয়প্রতিষ্ঠি হয়েই করতে হবে। আর তখনই মায়ের অমোঘ আশীর্বাদ আমাদের শিরে বর্ষিত হবে।

স্বামী সারদানন্দের "ভারতে শক্তিপূজা" থেকে এই বিষয়ে একটু তুলে ধরেই আমি আমার লেখা শেষ করছি:-------

  " অন্য দেশে মা শত হস্তে ধনধান্য ঢালিয়া  দিতেছেন। দেখিয়া ঈর্ষায় তোমার অন্তস্থল জ্বলিয়া উঠে। তাহাদের হৃষ্ট-পুষ্ট  সন্তানসকলের প্রফুল্ল মুখকমলের সহিত  ক্ষুৎক্ষামকণ্ঠ, আচ্ছাদনবিরহিত, রোগে জর্জরিত তোমর সন্তানসকলের তুলনা করিয়া তুমি জগদম্বাকেই শত দোষে দোষী কর। অন্যের পদঘাতপীড়িত  হইয়া তুমি অদৃষ্টকে শতবার ধিক্কার দিয়ে থাক--- কিন্তু দোষ কার?

দেখিতেছ না , তাহারা অজ্ঞান সমরে সামর্থ প্রকাশ করিয়াই বড় হইয়াছে--- আর তুমি সহস্র বৎসর অজ্ঞানকে হৃদয়ে অতি যত্নে পোষণ করিয়া নীরবে , নিশ্চিন্ত আছ?  উহারা বিদ্যরূপিনী শক্তির পূজার অদম্য উৎসাহে কষ্ট সহিয়াছে , অজস্র হৃদয়ের রুধির ব্যায় করিয়াছে, দশের  কল্যাণের জন্য আত্মবলি দিয়া দেবীকে প্রসন্ন করিয়াছে-- আর তুমি অবিদ্যাসেবায় যথাসর্বস্ব পণ করিয়া ক্ষুদ্র স্বার্থসুখ লইয়া বসিয়া আছ। জগন্মাতা তোমায় দিবেন কেন? 

শাস্ত্র যে তোমায় বারবার বলিতেছেন, তিনি বলিপ্রিয়া, রুধির প্রিয়া। দেবীর ঐ ভাব যে তাঁহার ধ্যানমন্ত্রে রহিয়াছে। ঐ শুন, ভারতের তন্ত্রকার তোমায় কি ভাবে শক্তির ধ্যান করিতে বলিতেছেন---


"ওঁ শবারুঢ়াং মহাভীমাং ঘোরদংস্ট্রাং বরপ্রদাম্।

হাস্যযুক্তাং ত্রিনেত্রাঞ্চ কপালকর্ত্তৃকাকরাম্।।

মুক্তকেশীং লোলজিহ্বাং পিবন্তীং রুধিরং মুহু। 

চতুর্ব্বাহুযুতাং দেবীং বরাভয়করাং স্মরেৎ।।"

প্রতিকার্যে  মহাশ্রদ্ধাসম্পন্ন হইয়া স্বার্থসূখ ত্যাগ , আত্মবলিদানে তাঁহার তর্পণ কর। তাঁহাকে প্রশ্ননা কর, দেখিবে শক্তিরূপিনী জগদম্বা  তোমার প্রতি ফিরিয়া চাহিবেন। তোমার নয়নে দীপ্তি, বাহুতে বল, হৃদয়ে তেজ, অন্তরে অদম্য উৎসাহরূপে প্রকাশিত হইবেন। দেখিবে  জগন্মাতার নিত্য সহচরীদল---বুদ্ধি, লজ্জা,ধৃতি, মেধা, প্রভৃতি -- আবার তোমার উপর প্রসন্না হইয়া প্রতি কার্যে তোমার সহায়তা 

করিবেন।"

 <-------আদ্যনাথ রায় চৌধুরী-------->

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Friday, January 24, 2025

9>aith 43>পঞ্চ ম-কার ও,::আগম,নিগম,তন্ত্র ।(1+)

  43>পঞ্চ ম-কার ও,::আগম,নিগম,তন্ত্র ।

43/1>||  বামাচার উপাসনা ||

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43>পঞ্চ ম-কার ও,::আগম,নিগম,তন্ত্র ।

               (সংগৃহীত)

তন্ত্রশাস্ত্রে পঞ্চ ম-কার সাধনার উল্লেখ আছে।

পঞ্চ ম-কার অর্থাৎ পাঁচটি দ্রব্যের আদ্য অক্ষর "ম"। যথা মদ্য, মাংস, মৎস্য, মুদ্র, ও মৈথুন এই পাঁচটিকে এক কথায় পঞ্চ ম-কার বলে।

পঞ্চ ম-কারের সাধন ফলও অসীম।

  "মদ্যং মাংসং তথা মৎস্যং মুদ্রা   

   মৈথুনমেব চ।

 ম-কারপঞ্চকং কৃত্বা পুনর্জন্ম ন বিদ্যতে।।"

পঞ্চ-মকার- সাধকের পুনর্জন্ম হয় না।

"পঞ্চমে পঞ্চমাকারঃ পঞ্চাননসমো ভাবেৎ" ।

পঞ্চ ম-কার সাধনায় সিদ্ধ সাধক শিব তুল্য হন।

■■

ষটচক্র, বিশেষ্য।

দেহাভ্যন্তরস্থ সুষুম্না নাড়ীর মধ্যবর্ত্তী অতি সূক্ষ্ম পদ্মাকৃতি ছয়টি চক্র। মূলাধার, স্বাধিষ্ঠান, মণিপুর, অনাহত, বিশুদ্ধ ও আজ্ঞা- এই ছয়টি চক্র। সকলের উর্দ্ধে সহস্রার পদ্ম।■■■■

পঞ্চ ম-কার আসলে পাঁচ উপচার, পাঁচ অঙ্গ বিশিষ্ট মাতৃকা উপাসনা, এবং জগন্মাতার আবাহন করতে পাঁচটি রিচুয়াল বা আচার হিসেবেই এর তাৎপর্য। মদ্য, মাংস, মৎস্য, মুদ্রা, মৈথুন – এই পাঁচটি হল পঞ্চ ম-কার। নামগুলোর স্থূল অর্থ স্পষ্ট, কাউকে বোঝাতে হবে না।

সাধারণে এই সাধনার প্রকৃত গুহ্য অর্থ বুঝতে না পেরে এই তত্ত্ব সম্বন্ধে নানা কথা বলে থাকেন।

আসলে কিছু অসৎ মানুষ মন্ত্র তন্তের নামে  মদ্যপান, মাংসভোজন, মৈথুনের অপব্যহার তথা বিক্রীত কুরুচি পূর্ন ব্যবহারে  বিশেষ মনযোগী হন। আর এভাবেই তারা লোভ ও লালসায় আকৃষ্ট হয়ে ক্রমবর্ধমান ব্যভিচারে জীবন অতিবাহিত করেণ ও সাধারণ মানুষকে ভুল পথে পরিচালনা করেন।

ফলে সাধারণ মানুষের মনে তন্ত্রশাস্ত্রের প্রতি  অশ্রদ্ধা  তৈরি হয়।

কিছু মানুষ তো তান্ত্রিকের নাম শুনলেই যেন ভয়ে শিহরিত হন।

আসলে কিছু মানুষ তন্ত্র সাধনার নামে আড়ালে ব্যাভিচার করতেই অভ্যস্থ।

কিন্তু প্রকৃত অর্থে মদ্য,মাংস,মৎস,মুদ্র, ও মৈথুন এই পাঁচটির প্রকৃত অর্থ নিম্ন রূপ::---

★মদ্য::--

(নির্বিকার নিরঞ্জন পরব্রহ্মতে যোগ সাধন দ্বারা যে প্রমদ-জ্ঞান, তাহার নাম মদ্য)

প্রকৃত তন্ত্রের সূক্ষ্ম মতে মদ্য অর্থ হোল--:

ধ্যানের বিশেষ ক্রিয়ার মাধ্যমে যখন ব্রহ্মরন্ধ্র হইতে অমৃত ধারা ক্ষরিত হয়, সেই অমৃত ধারা পান করিলে সাধক আনন্দময় হইয়া ওঠে। আর ইহাকেই বলা হয় মদ্য-সাধন।

★মাংস::---

(যে সব সৎকৃত কর্ম নিষ্কল পরব্রহ্মে  সমর্পণ করে, সেই কর্মসমর্পণের নাম মাংস।)

আবার সূক্ষ্ম তন্ত্র মতে মা রসনা শব্দের নামান্তর, বাক্য তদংশসম্ভুত, যে সাধক উহা ভক্ষণ করে , তাহাকেই মাংস-সাধক বলা হয়।

মাংস-সাধক ব্যক্তি প্রকৃত প্রস্তাবে 

বাক্যসংযমী ---মৌনাবলম্বী যোগী।

★মৎস::---

(সর্বভূতে আমার ন্যায় সুখ-দুঃখ সমজ্ঞান এই যে সাত্ত্বিক জ্ঞান তাহার নাম মৎস্য।)

---ইড়া ও পিঙ্গলা নারীকে গঙ্গা ও যমুনা বলা হয়।

এবং শ্বাস-প্ৰশ্বাসই দুটি মৎস্য।

এই গঙ্গা যমুনার মধ্যে দুইটি মৎস্য সতত চলিতেছে,

যে সাধক এই দুটি মৎস্য ভোজন করে তাহাকে মৎস্য-সাধক বলে।

যিনি প্রাণায়াম দ্বারা শ্বাস-প্ৰশ্বাস রোধ করিয়া কুম্ভকের পুষ্টি সাধন করেন, তাহাকেই মৎস্য-সাধক বলে।

★মুদ্রা::----

(সৎসঙ্গে মুক্তি আর অসৎসঙ্গে বন্ধন--ইহা জানিয়া অসৎসঙ্গ পরিত্যাগের নাম মুদ্রা।)

সদাশিব আদ্যাশক্তি ভগবতীকে বলিলেন 

হে দেবেশি! অর্থাৎ "দেবদের দেবী"

শিরস্থিত সহস্রদল পদ্মে মুদ্রিত 

কর্নিকাভ্যন্তরে শুদ্ধ পারদতুল্য আত্মার অবস্থিত। যদিও তাহার তেজ কোটি সূর্য্যের ন্যায়, কিন্তু স্নিগ্ধতায় কোটি চন্দ্রতুল্য। এই পরমপদার্থ অতিশয় মনোহর এবং কুন্ডলিনী- শক্তিসমন্বিত

---যাহার এরূপ জ্ঞানের উদয় হয় তিনিই, প্রকৃত মুদ্রা- সাধক।

★মৈথুন::---

(মুলাধারস্থিত কুন্ডলিনীশক্তিকে যোগ- সাধন দ্বারা  ষট-চক্রভেদপূর্বক শিরস্থিত

সহস্রদলকমল কর্নিকান্তর্গত বিন্দুরূপ পরমশিবের সহিত সংযোগ করার নাম মৈথুন।)

---মৈথুন ব্যাপক সৃষ্টি, স্থিতি ও প্রলয়ের কারণ, ইহা পরমতত্ত্ব বলিয়া শাস্ত্রে উক্ত আছে।

মৈথুন ক্রিয়াতে সিদ্ধিলাভ ঘটে এবং তাহা হইতে সুদূর্লভ ব্রহ্মজ্ঞান লাভ হয়।

সে মৈথুন কিরূপ?

কুমকুমবর্ন রেফ কুন্ডমধ্যে অবস্থিত করে, ম-কার বিন্দুরূপে মহাযোনিতে অবস্তিত।আকাররূপী হংসের আশ্রয়ে যখন ঐ উভয়ের একতা ঘটে, তখন সুদুর্লভ ব্রহ্মজ্ঞান লাভ হয়।

যে সাধক ঐ ভাবে মিলন করিতে সক্ষম তিনিই মৈথুন-সাধক।

মৈথুনে যেরূপ আলিঙ্গন, চুম্বন,শীৎকার, অনুলেপ, রমণ এবং রেতোৎসর্গ এই ছয় কৌশল বলিয়া কীর্তিতে, সেইরূপ  আধ্যান্তিক মৈথুন  প্রক্রিয়াতে ও এই প্রকার ছয়টি অঙ্গ দেখা যায়।

যোগক্রিয়ার তত্ত্ব গুলির নাম আলিঙ্গন, ধ্যানের নাম চুম্বন ,

আবাহনের নাম শীৎকার, 

নৈবেদ্যের নাম অনুলেপন, 

জপের নাম রমণ এবং 

দক্ষিনান্তের নাম রেতঃপাতন।

ষড়ঙ্গ যোগে এইরূপ ষড়ঙ্গ সাধন করার নামই মৈথুন- সাধন।

এইপ্রকারে পঞ্চ ম-কার যোগ সাধন ক্রিয়া এক বিশেষ যোগ ক্রিয়া তাতে কোন সন্দেহ নাই।

প্রকৃত পক্ষে তন্ত্র ও যোগ উভই সদাশিব কথিত।

মদ্যাদি সেবনের উদ্দেশ্যে ধর্ম নয়,

পরন্তু ধর্মের উদ্দেশ্যেই পঞ্চতত্ত্বানুষ্ঠানের

প্রয়োজনীয়তা।

মদ্যপান কালে হৃদয়ে যে ভাব পোষণ করা যায় , তাহাই উচ্ছসিত হইয়া থাকে এবং একাগ্রতায় দৃঢ় হইয়া উত্তরোত্তর সাধনার পথে অগ্রসর হয়।

সাধকের পানের জন্য সাধনা নয়,

সাধনার জন্যই পান।

সঠিক মন্ত্র পূত মদ্য পানে মদ্য তেজোধর্মী হয়, তখন উহা সাধনানুযায়ী কুন্ডলিনী শক্তির  মুখে আপতিত হইয়া কুন্ডলিনী শক্তিকে উদ্বোধিতা করে, এবং এই জন্যই সাধকের মদ্যপান।

মদ্য পান করিয়া মাতাল হওয়া অর্থ পশুরুপে গণ্য হইয়া ভ্রষ্ট  কুলধর্ম চ্যুত হওয়া।

★★>

পঞ্চমকার বা পঞ্চতত্ত্ব হলো তান্ত্রিক অনুশীলনে পাঁচটি সীমালঙ্ঘনকারী পদার্থের জন্য তান্ত্রিক শব্দ। 

এগুলো হলো মদ্য, মাংস, মৎস্য, মুদ্রা  ও মৈথুন ।

 উপাদানগুলি কেবল "বামপন্থ"-এর তান্ত্রিকদের (বামাচারী) দ্বারা অনুশীলন করা হয়, যেখানে "ডানপন্থ"-এর তান্ত্রিকরা (দক্ষিণাচারী) এগুলির বিরোধিতা করেন।

মহানির্বাণতন্ত্র মতে, পুরুষদের তিনটি শ্রেণি: পশু, বীর ও দিব্য। গুণের ক্রিয়াকলাপ যা এই ধরনের প্রভাব উৎপাদন করে স্থূল পদার্থের স্থলে প্রাণীর প্রবণতা প্রভাবিত করে; তিনটি প্রধান শারীরিক ক্রিয়াকলাপে উদ্ভাসিত: খাওয়া দাওয়া, যার দ্বারা অন্নময় কোষ বজায় থাকে; এবং যৌন মিলন, যার দ্বারা এটি পুনরুৎপাদন করা হয়। এই ক্রিয়াকলাপসমূহ পঞ্চতত্ত্ব বা পঞ্চমকার -এর বিষয়, কারণ এগুলিকে অশ্লীলভাবে বলা হয় — যেমন: মদ্য (মদ), মাষ (মাংস), মৎস্য (মাছ), মুদ্রা (শুষ্ক শস্য) ও মৈথুন। সাধারণ বিবেচনায় মুদ্রার অর্থ "আচার" এবং অঙ্গভঙ্গী বা উপাসনা ও হঠযোগে দেহের অবস্থানসমূহ তবে এটি পাঁচটি উপাদানের মধ্যে একটি হিসাবে এটি ভাজা শস্য। তান্ত্রিকরা পাঁচটি উপাদানকে পঞ্চতত্ত্ব, কুলদ্রব্য, কুলতত্ত্ব ও মদের জন্য কারণবারি বা তীর্থবারির মতো বিশেষ নাম দিয়েছেন, পঞ্চম উপাদানটিকে সাধারণত "লতা-সাধন" (নারী বা শক্তি সহ সাধনা) বলা হয়। তামসিক (পশ্বাচার), রাজসিক (বীরাচার) বা দিব্যাচার বা সাত্ত্বিক সাধনার অংশ হিসাবে এই পাঁচটি উপাদানগুলির বিভিন্ন অর্থ রয়েছে।

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★★★★>আগম ও নীগম::---

এই জগৎ মাঝে দুইটি পথ প্রশস্ত 

একটি নিবৃত্তি ও অপরটি প্রবৃত্তি।

প্রকৃত পক্ষে নিবৃত্তি -- যোগ

আর প্রবৃত্তি ---ভোগ।

আগম শাস্ত্রে পঞ্চ ম - কার নিবৃত্তির পথে,

আর মহা নির্বাণ তন্ত্র প্রভৃতির বর্ণিত স্থূল পঞ্চ ম-কার প্রবৃত্তির পথে।

আগম ও নীগম::---

"তন্ত্র" বেদের শেষাংস থেকে সৃষ্টি যাকে আগম বলে আর বেদকে নিগম বলে।

তন্ত্র::----

তন্ত্র হলো ভারতে খ্রিস্টীয় পঞ্চম শতাব্দীর পর প্রচলিত এক বিশেষ ধরনের উপাসনা ও সাধনপদ্ধতির নাম। "তন্ত্র" বেদের শেষাংস থেকে সৃষ্টি যাকে আগম বলে আর বেদকে নিগম বলে।

 হিন্দু, তিব্বতীয় বোন, দাও তথা জাপানের শিন্টো, বৌদ্ধ ও জৈন মতবাদগুলিকে এবং পূর্ব ও দক্ষিণপূর্ব এশিয়ায় রেশম পথে বৌদ্ধধর্মের সম্প্রসারণে তন্ত্র বিশেষ প্রভাব বিস্তার করেছিল। 

তন্ত্র পরম্পরাগত মাধ্যমে যুক্ত একটি আগমশাস্ত্র। ভারতীয় পরম্পরায়, যে কোনো ব্যবস্থিত গ্রন্থ, সিদ্ধান্ত, বিধি, উপকরণ, কলাকৌশল বা কার্যপ্রণালীকেও তন্ত্র বলা হয়। 

হিন্দু ঐতিহ্যে, তন্ত্র প্রধানত শাক্ত সম্প্রদায়ের সঙ্গে যুক্ত, তারপর শৈব সম্প্রদায়, ও কিছু ক্ষেত্রে বৈষ্ণব পরম্পরার সাথেও সম্পৃক্ত।  শৈব পরম্পরায় তন্ত্র গ্রন্থের বক্তা সাধারণত মহাদেব শিব, যেখানে তিনি দেবী পার্বতীর তন্ত্রসম্বন্ধীয় প্রশ্নের বিধিগত উপদেশমূলক উত্তর প্রদান করেন। বৌদ্ধধর্মের বজ্রযান সম্প্রদায় তাঁদের তন্ত্র-সম্বন্ধিত নীতি, কর্মপদ্ধতি ও সাহিত্যের জন্য প্রসিদ্ধ।

তন্ত্র-এর আক্ষরিক উদ্ভব মনে করা হয় এরূপে - “তনোতি ত্রায়তি তন্ত্র”।

তন্ত্রশাস্ত্রকে উত্তর-বৈদিক যুগের রচনা বলে মনে করা হয়, যার বিকাশলাভ প্রথম সহস্রাব্দের মধ্যভাগের কাছাকাছি সময়ে ঘটেছিল। সাহিত্যরূপে যেভাবে পুরাণ গ্রন্থকে মধ্যযুগীয় দার্শনিক-ধার্মিক রচনা হিসাবে মান্য করা হয়ে থাকে, সেভাবেই তন্ত্রশাস্ত্রে প্রাচীন আখ্যান, কাহিনি ইত্যাদির সমাবেশ রয়েছে। বিষয়বস্তুগত দৃষ্টিতে একে ধর্ম, দর্শন, সৃষ্টিরচনা শাস্ত্র, প্রাচীন বিজ্ঞান ইত্যাদির বিশ্বকোষও বলা যেতে পারে। ইউরোপীয় পণ্ডিতেরা তাঁদের ঔপনিবেশিকতাবাদী উদ্দেশ্যসাধনে তন্ত্রকে 'গুহ্য সাধনা' (esoteric practice) বা 'সাম্প্রদায়িক কার্যকলাপ' আখ্যা দিয়ে দিগভ্রান্ত করার চেষ্টা করেন।  

বস্তুত তন্ত্রগ্রন্থের সংখ্যা সহস্রাধিক, কিন্তু প্রধান-প্রধান তন্ত্র ৬৪টি বলা হয়ে থাকে। তন্ত্রের প্রভাব যে বিশ্বস্তরীয়, তার প্রমাণ হিন্দু, বৌদ্ধ, জৈন, তিব্বতি ইত্যাদি ধর্মের তন্ত্র-সাধনার গ্রন্থসমূহ। ভারতে প্রাচীনকাল থেকেই বঙ্গ, বিহার ও রাজস্থান তন্ত্রের মুখ্যপীঠ ছিল।

★★★

ব্যাকরণ শাস্ত্র অনুসারে, 'তন্ত্র' শব্দটি 'তন্' ধাতু নিষ্পন্ন যার অর্থ 'বিস্তার'। শৈব সিদ্ধান্তের 'কায়িক আগম' -এ এর অর্থ দেওয়া হয়েছে — তন্যতে বিস্তার্যতে জ্ঞানম্ অনেন্, ইতি তন্ত্রম্ (সেই শাস্ত্র যার দ্বারা জ্ঞানের বিস্তার করা হয়)। তন্ত্রের নিরুক্তি ‘তন’ (বিস্তার করা) এবং ‘ত্রৈ’ (রক্ষা করা), এই দুই ধাতুর সংযোগে সিদ্ধ হয়। অর্থাৎ, তন্ত্র সামগ্রিকভাবে জ্ঞানের বিস্তার করা ছাড়াও এর ব্যবহারকারীকে 'ত্রাণ' (রক্ষা) -ও করে থাকে।

তন্ত্রশাস্ত্রের আরেক নাম 'আগমশাস্ত্র'ও বটে। এই বিষয়ে বলা হয়েছে যে,

আগমাত্ শিববক্রাত্ গতং চ গিরিজা মুখম্।

সম্মতং বাসুদেবেন আগমঃ ইতি কথ্যতে।।

বাচস্পতি মিশ্র তাঁর যোগভাষ্যের তত্ববৈশারদী ব্যাখ্যায় 'আগম' শব্দের অর্থ করতে গিয়ে লিখেছেন যে, যার দ্বারা অভ্যুদয় (লৌকিক কল্যাণ) ও নিঃশ্রেয়স (মোক্ষ) -এর উপায় বুদ্ধিগোচর হয়, তাকে 'আগম' বলা হয়।

তন্ত্র বা আগমে ব্যবহারই মুুখ্য; তন্ত্রে ক্রিয়া ও অনুষ্ঠানের প্রতি জোর দেওয়া হয়। তন্ত্রশাস্ত্রের যে সাতটি লক্ষণ রয়েছে, তাতে জ্ঞান, কর্ম ও উপাসনার ব্যবহারিক বা আচরণীয় উপায়ের রূপ বর্ণিত হয়েছে। এই সাতটি লক্ষণ হল:

●সৃষ্টি

●প্রত্যয়

●দেবার্চনা

●সর্বসাধন (সিদ্ধিসমূহ প্রাপ্ত করার উপায়)

●পুরশ্চরণ (মারণ, মোহন, উচাটন ইত্যাদি ক্রিয়াসমূহ)

●ষটকর্ম (শান্তি, বশীকরণ, স্তম্ভন, বিদ্বেষণ, উচাটন ও মারণের প্রক্রিয়া) তথা,

●ধ্যান (ইষ্টদেবতার স্বরূপ একাগ্র তল্লীন মনে চিন্তন)

তন্ত্রের দৃষ্টিতে শরীর প্রধান নিমিত্ত; শরীর ছাড়া চেতনার উচ্চস্তরে পৌঁছানো যায় না। এজন্য তন্ত্রের গূঢ়ার্থ নিজ 'তন' বা দেহের মাধ্যমে আপন আত্মার 'ত্রাণ' বা উদ্ধারও বলা হয়ে থাকে। বাস্তবক্ষেত্রে, তন্ত্রসাধনায় শরীর, মন ও কায়-কলেবরের সূক্ষতম স্তরের সুসমন্বিত ব্যবহার ঘটে। তবে এটি অবশ্যই সত্য যে, তন্ত্রে শরীরকে মন, বুদ্ধি ও চেতনার সমানই প্রাধান্য দেওয়া হয়।

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★★★>আগম, নিগম, তন্ত্র এবং বেদ। 

আগাম- হল "যা শিবের মুখ থেকে উদ্ভূত", 

তাই আগম তন্ত্র। এগুলো বিশেষত তামিল ও কাশ্মীর শৈব ঐতিহ্যের জ্ঞান।

স্থূল চিন্তায় আগামা হল "সাময়িক", আর নিগামা হল "বিমূর্ত" বা "উচ্চ-মাত্রিক" জ্ঞান, অর্থাৎ মূর্তিহীন, ভাবমূলক, অনবয়ব।

যেমন, আগামা প্রেসক্রিপটিভ অর্থাৎ নির্দেশ বা আদেশ এবং প্রাত্যহিক জীবনে দরকারী মৌলিক জ্ঞান, দক্ষতা এবং ক্ষমতা তৈরিতে একান্ত প্রয়োজন হয়।

অন্যদিকে, নিগম অর্থাৎ বেদ, হল ব্রহ্মবিদ্যা বা আত্মজ্ঞানের অনুসন্ধানের উপর জ্ঞান দৃষ্টি নিবদ্ধ করে এবং তাই নির্দেশমূলক না হয়ে  এটি অনুসন্ধানমূলক হয়ে থাকে। এবং যেহেতু এটি সহিত বুদ্ধিবৃত্তিক সাধনা জড়িত, সেই হেতু এটি তাদের জন্য বোঝানো হয়েছে যারা বুদ্ধিবৃত্তিকভাবে অভিমুখী, ব্রাহ্মণ বা ঐতিহ্যের পণ্ডিত।

বিমূর্ত বা মূর্তিহীন, ভাবমূলক, অনবয়ব জ্ঞানের যোগ্যতা সবার থাকে না। তথাপি পুরুষার্থ সর্বদা সবার জন্য। 

নিগম প্র্দ্ধতির প্রারম্ভিক ঐতিহ্যে যজ্ঞ হল প্রাথমিক পদ্ধতি বা অনুশীলন।

বেদের অপর নাম নিগম।

আগামগুলি এমন পাঠ্যগুলি যা ধর্মীয় উপাসনার সাথে সম্পর্কিত। মন্ত্র, যন্ত্র, মন্দির এবং মূর্তি নির্মাণের পদ্ধতি এবং তাদের পূজা, আমরা বাড়িতে যে পূজা করি তা অন্যান্য বিষয়ের মধ্যে আগামগুলিতে শেখানো হয়। বৈষ্ণব, শৈব ও শাক্ত আগম আছে।

শাক্ত আগমকে তন্ত্র বলা হয়।

শুধু বেদকেই শ্রুতি বলা হয়।

নিগামা ('যার দ্বারা [সত্য জানা যায়] স্পষ্টভাবে')

হিন্দু শাস্ত্রে 'নিগমা' শব্দটি বিভিন্ন অর্থে ব্যবহৃত হয়েছে। যেহেতু সর্বোচ্চ সত্য বেদের মাধ্যমে সঠিকভাবে জানা বা বোঝা যায়, তাই তারা 'নিগম' নামে পরিচিত। আদেশের বাক্যগুলিও তাদের মধ্যে রয়েছে।

সমস্ত আপত্তির মোকাবিলা করার পরে প্রতিষ্ঠিত একটি সুনির্দিষ্ট উপসংহারকে যুক্তি বিজ্ঞানে 'নিগামা' বা 'নিগমনা'ও বলা হয়, যাকে কখনও কখনও 'নিগমা' নামেও ডাকা হয়।

আরও প্রযুক্তিগত অর্থে, 'আগামা' শব্দটি সেই সমস্ত তান্ত্রিক কাজের জন্য ব্যবহৃত হয় যেখানে সদাশিব দেবীকে শিক্ষা দেন এবং সেই কাজের জন্য 'নিগম' শব্দটি ব্যবহৃত হয়।

               (সংগৃহীত)

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   43/1>||  বামাচার উপাসনা ||

          <------আদ্যনাথ------>

বামাচার বা বামমার্গ তন্ত্রের এক গুরুত্বপূর্ণ মার্গ ।

ঠিক তেমনি বামাকালীর উপাসনাও এক গরুত্ত্বপূর্ন উপাসনা। আর তন্ত্র মতে পূজার এক গুরুত্বপূর্ণ অঙ্গ পঞ্চ-ম-কার।

বামাচার হল একাধিক উপচার সহযোগে পূজার এক সুপ্রাচীন প্রক্রিয়া। আর এই প্রক্রিয়ার সাধনার সাথে যুক্ত পঞ্চ ম-কার আসলে পাঁচ উপচার বা পাঁচ অঙ্গ বিশিষ্ট মাতৃকা উপাসনা, এবং জগন্মাতার আবাহন করতে তথা আরাধনার সত্ত্বর সাফল্য  লাভের নিমিত্ত্বে পাঁচটি আচার হিসেবেই এর তাৎপর্য।

মদ্য, মাংস, মৎস্য, মুদ্রা, মৈথুন – এই পাঁচটি হল পঞ্চ ম-কার। নামগুলোর স্থূল অর্থ সকলের নিকটই অতি সহজ ভাবে

স্পষ্ট।  কিন্তু এই পঞ্চ ক্রিয়ার সূক্ষ্ম অর্থ সন্ধানের মধ্যেই আসল তত্ব নিহিত আছে।

স্থূল অর্থের সামগ্রী সহযোগে সাধন অর্থ ভণ্ডামি ও ব্যাভিচার।সেই কারণেই বামাচারী সাধনমার্গের তাৎপর্য একটু আলোচনা করা বিশেষ প্রয়োজন।

1>◆■■◆ প্রথম তাৎপর্য:----

তন্ত্র হল ভুক্তি এবং মুক্তির সামঞ্জস্য বিধান। 

তন্ত্রে পবিত্র এবং অপবিত্রর কোন ভেদাভেদ নাই বললেই চলে।সাথে সাথে কোন প্রকার বর্ণভেদও নাই,অর্থাৎ কোন উচ্চ নিচ বিভাজন নেই, তেমনি দেহ এবং চৈতন্য তন্ত্রে পৃথক নয়। বলাহয় তন্ত্র,বস্তু এবং ভাবের সমন্বয়। সেই হেতু সর্বদা সমদৃষ্টি রাখার জন্য তন্ত্রে কতগুলি অত্যাবশ্যক অনুশীলন আছে। বামাচার হল এমন একটি অনুশীলন যেখানে নির্বাণ, ভোগ, মোক্ষমার্গ, প্রবৃত্তি,উপভোগ, আনন্দ যেখানে সাধনার অঙ্গ। 

2>◆■■◆দ্বিতীয় তাৎপর্য:-------

তন্ত্রমার্গ সোজা ও সরল মর্গ, এমনকি তন্ত্রমার্গে সংসারত্যাগ ও নয়,কোনপ্রকাদ ভেদা ভেদ নয়। সকলকে নিয়েই তন্ত্র। উঁচু নিচু বিভেদ, ব্রাহ্মণ শূদ্র বিভেদ, পবিত্র অপবিত্র বিভেদ, দেহ আত্মা বিভেদ, নারী পুরুষ বিভেদ এবং সর্ব প্রকার বৈষম্য পরিত্যাগ করার আহ্বান জানায় তন্ত্র, আর এজন্যই পঞ্চ ম-কার প্রয়োজন। তন্ত্র সাধন মনেকরে কোন প্রকার বর্ণবাদ এবং শুচিবাই বা ছুৎ বিচার নিয়ে সাধনা তন্ত্র সাধন হয় না।

3>◆■■◆ তৃতীয় তাৎপর্য:---------- বামাচার শব্দের দুটি প্রধান অর্থ। বাম অর্থাৎ বাঁদিকের পথ। দ্বিতীয়ত বামা হল আমাদের জগন্মাতা মা কালীর অন্যতম শাস্ত্রীয় নাম, এই নামটি মা তারার উদ্দেশ্যেও ব্যবহার করা হয়। অতএব বামাচার হল কালীপথ বা তারাপথ।

কিন্তু বাঁদিক কেন? বাম শব্দের একটি অর্থ হল বিপরীত। যেমন বিধি বাম মানে বিপরীত বিধি। এই অর্থে বাম মার্গ নেগেটিভ অর্থ

 অর্থ বিভ্রান্তিও হয়। এক্ষেত্রে বামাকালীর অন্যতম তাৎপর্য হল যিনি বিভ্রান্তি দূর করে দেন। যেমন দক্ষিণাকালীর তাৎপর্য: যাঁর ভয়ে দক্ষিণদিকের অধিপতি যম পালিয়ে যান।

আবার সাংখ্যর সঙ্গে তন্ত্রের প্রাচীন যোগাযোগ আছে। সংখ্যা গণনা আদিযুগে বামদিকে হত: অঙ্কস্য বামা গতি। যেহেতু তন্ত্রর অন্যতম গুরুত্বপূর্ণ স্তম্ভ ছিল সংখ্যাবিজ্ঞান, সেজন্যও বাম মার্গ নাম হতে পারে।

4>◆■■◆ চতুর্থ তাৎপর্য: মা কালীর বামাচার আদি প্রস্তর যুগ থেকে, ঠিকঠাক বললে চল্লিশ হাজার বছর আগে যখন থেকে প্রথম মাতৃকা মূর্তি পাওয়া যায়, তখন থেকে প্ৰচলিত আদিম মাতৃসাধনার সুবিশাল আন্তর্জাতিক ঐতিহ্য বহন করে। অনেক আদিম জাতি মাতৃকা উপাসনা করত, মাতৃধর্মের উৎসব হত। এবং যেহেতু মদ্য ও মাংস পৃথিবীর যে কোনও জায়গায় আদিমকালে উৎসবে ব্যবহার করা হত, তাই অনেক গবেষক মনে করেন যে বামাচার সেই আদিম স্মৃতিবাহী।

মনে রাখতে হবে, স্থূলভাবে এই পাঁচটি ম আনন্দ, সম্পদ এবং প্রাণসৃষ্টির কারণ।

 মা আদ্যা। তিনি আদি থেকে আছেন। আমরা সুসভ্য একুশ শতকের মানুষ যেমন তাঁর সন্তান, আদিম মানুষও আদিম উপায়ে তাঁর উপাসনার সমান অধিকারী ছিল।

5>◆■■◆ পঞ্চম তাৎপর্য: অর্থাৎ স্থূল অর্থে বামাচারের প্রয়োগ তন্ত্রের বাইরে নয়, সম্পূর্ণভাবে তন্ত্র অনুমোদিত। কিন্তু সূক্ষ্ম অর্থে বামাচারের প্রয়োগ বর্তমান সভ্য সমাজে, গৃহী ব্যক্তি অনেক সহজে করতে পারেন। মা আদ্যা এবং নিত্যা। কিন্তু আমরা তাঁর সীমাবদ্ধ সন্তান, আমরা প্রাচীন প্রস্তরযুগের মত অথবা আদিম মাতৃকা উপাসক জাতিগুলোর মত অবাধ নই, কারণ সভ্যতা অগ্রসর হলে আমাদের কিছু কিছু নিয়ম শৃঙ্খলা মেনে চলতে হয়।

আর সেই কারণেই বামাচারের পঞ্চ ম-কারের সূক্ষ্ম তাৎপর্য জানা বিশেষ প্রয়োজন।

6>★★★★★ প্রথম ম-কার: সূক্ষ্ম অর্থে বামাচারে মদ্য হল সাধক যখন অতিশয় আনন্দে থাকেন, অথবা খেচরী মুদ্রা অভ্যাস করেন, তখন মুখের মধ্যে নিঃসৃত লালা। সুস্থ মানুষের মুখের মধ্যে লালা নিঃসৃত হয়েই থাকে, মুখ শুকিয়ে গেলেই সেটা চিন্তার, ডাক্তার দেখাতে হয় অনেকসময়। কাজেই এইভাবে প্রথম ম-কারে মায়ের আবাহনে কঠিন কিছু নেই।

লালা কেন মদ্যের প্রতীক? অতিশিশু এবং অতিবৃদ্ধরা বেসামাল থাকেন, লালা সামলাতে পারেন না। মানুষ বিবশ হলে লালাক্ষরণ নিয়ন্ত্রণ করতে পারে না। মদ্য অনুরূপভাবে আমাদের নিয়ন্ত্রণহীনতা বা অবশতার প্রতীক। সেজন্য লালা হল সূক্ষ্ম মদ্য।

7>★★★★★দ্বিতীয় ম-কার: মাংস হল জিহ্বা থেকে উদ্গাত মাতৃমন্ত্র।

জিহ্বা তো মাংসল অঙ্গ বটেই, সচেতন মাংস। জিহ্বা সেই মাংস যা মন্ত্রপূত, মন্ত্রপ্রবিষ্ট, মন্ত্রের উচ্চারক। মায়ের মন্ত্র উচ্চারণ তো সবাই করেন পূজার সময়, কাজেই দ্বিতীয় ম-কারে কঠিন কিছুই নেই।

8>★★★★★ তৃতীয় ম-কার: মৎস্য হল চক্ষু। চর্মচক্ষু বা মানসচক্ষু দিয়ে মায়ের মূর্তি দর্শন বা ধ্যান করাই মৎস্য উপচারে মায়ের পুজো। এটাও আমরা করে থাকি অবলীলায়।

মাছকে চক্ষুর সঙ্গে তুলনা করা হয় প্রাচীন কাল থেকেই। মীনাক্ষী হল মহাদেবীর অন্যতম নাম। মাছের মতোই আমাদের চক্ষু যেন চঞ্চলভাবে সাঁতার কাটে, ডুবে যায়, ভেসে ওঠে, বিহার করে, কামনার বড়শিতে আটকে যায়, আবার কখনও কখনও পরিযান করে এক জলরাশি থেকে আরেক জলরাশিতে। 

9>★★★★★ চতুর্থ ম-কার: মুদ্রা হল আমাদের শরীরের নানা রকম অঙ্গভঙ্গি এবং অবশ্যই যোগমুদ্রা।  নমস্কার করলে দুহাত জড়ো করে যা করাহয়, তাও মুদ্রা। মায়ের সামনে পদ্মাসনে উপবিষ্ট হয়ে পুজো করা, সেটাও মুদ্রা। অষ্টাঙ্গ প্রণাম করলেও মুদ্রা। হরপ্পা সভ্যতায় নানারকম যোগমুদ্রা প্ৰচলিত ছিল, প্রত্ন প্রমাণ আছে।

10>★★★★★ পঞ্চম ম-কার: মৈথুন হল কুণ্ডলিনী সাধনা। কুণ্ডলিনী তত্ত্ব তন্ত্রের অন্যতম কেন্দ্রীয় তত্ত্ব। এবং দেহে মূলাধার চক্র থেকে সহস্রার চক্র পর্যন্ত কুণ্ডলিনী গমন করলে সেখানে কুণ্ডলিনী শক্তির সঙ্গে চেতনা/পুরুষতত্ত্ব/●কনশাসনেসের মৈথুন ঘটে।


●(কনশাসনেস অর্থাৎ চেতনা মনের একটি ধর্ম বা বৈশিষ্ট্য যাকে আরও অনেকগুলি মানসিক বৈশিষ্ট্যের সমষ্টি হিসেবে গণ্য করা হয়, যেমন আত্মমাত্রিকতা, আত্মচেতনা, অনুভূতিশীলতা, পৃথকীকরণ ক্ষমতা, এবং নিজের সত্তা ও আশেপাশের পরিবেশের মধ্যকার সম্পর্ক অনুধাবনের ক্ষমতা।)

সেই কারণেই পঞ্চ ম-কার তন্ত্রের বলিষ্ঠ বস্তুনিষ্ঠতার প্রতীক। স্থূল হোক বা সূক্ষ্ম, পঞ্চ ম-কার আমাদের বস্তুজগৎ থেকে উৎপন্ন, সংশ্লিষ্ট, সম্পৃক্ত ভাব।

 "মা" জগদকারণ। তিনিই বিশ্বচরাচর। তাই জীব ও জড়, ভাব ও বস্তু, দেহ এবং চেতনা আলাদা নয়। পঞ্চ ম-কার সেই শিক্ষা দেয়।

মা রূপে সেই অব্যক্ত প্রকৃতির ধ্যান, আবাহন ,ও আরাধনায় ম অক্ষরের এত প্রাবল্য।

[★★■★★  ]-------

 সূক্ষ্ম পঞ্চ ম-কার সাধনার সবথেকে আশ্চর্য বিষয় হলো  মায়ের পুজো আসলে নিজেই নিজের দেহে করতে হয়। অর্থাৎ নিজেই, নিজেকে পুজো করা।

মা আমাদের হৃদয়ে প্রতিষ্ঠিত আছেন। স্থূল পঞ্চ ম-কার বাহ্যিক। কিন্তু সূক্ষ্ম পঞ্চ ম-কার আসলে আমাদের দেহকে ব্যবহার করেই মায়ের পুজো। সেজন্য পঞ্চ ম-কারের এই সূক্ষ্ম অর্থে লালা (মদ্য), জিভ (মাংস) চোখ (মৎস্য), সমগ্র শরীর (মুদ্রা) এবং কুণ্ডলিনী (মৈথুন) সহযোগে মাতৃকার ধ্যান আসলে আমাদের দেহ মন্দিরেই মায়ের পুজো। এবং মায়ের ভক্ত মাত্রেই অনায়াসে এই পুজোর অধিকারী। 

এই যে একটা ধারণা আছে যে বামাচার মানেই হল দুরূহ, অতি গুহ্য, কেবলমাত্র সংসারত্যাগী,  তান্ত্রিকদেরই অধিকার  – 

বামাচার। এটা একেবারেইঠিক নয়। 

স্থূল বামাচার সাধকের কৃত কর্মে হয়তো অসামাজিক হতে পারে, কিন্তু সূক্ষ্ম বামাচার সকলের জন্যই সহজ ও ঋজুপথে মাতৃসাধনা সুগম করে। 

সেই কারণে মায়ের সন্তান মাত্রেই বামাচারে মা বামাকালীর পুজো করতে পারেন। বরং সূক্ষ্ম বামাচার, সূক্ষ্ম পঞ্চ ম-কারেই মায়ের পুজো অনেক বেশি তদ্গত ও তন্নিষ্ঠ হয়, কারণ এক্ষেত্রে দেহমন্দিরেই মায়ের ঐশ্বর্যের আবাহন ও উদযাপন হয়, বাহ্যিক আড়ম্বর ছাড়া।

    <----আদ্যনাথ রায় চৌধুরী---->

             0/0/2009

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